द्रोपदी का प्रतिशोध खंड काव्य : नारी सब पर भारी - डॉ० अनीता भारद्वाज अर्णव
जब-जब समाज में मर्यादाओं की अवहेलना होती है धरती काँप उठती है अम्बर डोल उठता है ।मर्यादा हीन व्यक्ति की बौद्धिक आत्मिक एवं मानसिक शक्तियों का स्रोत विकृत हो जाता है। जब एक व्यक्ति अन्य की स्वतंत्रता का हनन करता है तब समाज भले ही उसे दंडित करे या ना करे किंतु हनित व्यक्ति का प्रतिशोध उसे विनाश के मार्ग पर ले जाता है। विशेषत: नारी अस्तित्व पर बुरी नज़र डालने वाला व्यक्ति कभी सुरक्षित नहीं रह सकता। भले ही उसे सात तालों में बंद करके रखा जाए।
साहित्यकारों ने सदा अपनी लेखनी के माध्यम से समाज को आईना दिखया है। रुचि अनुसार गद्य अथवा पद्य में अनेक विषयों को रोचक शैली में अंकित किया है।काव्य की अनेक विधाओं में खंडकाव्य विशेष पक्ष को आलौकित करती विधा है ।खण्डकाव्य में नायक अथवा नायिका के दैहिक, दैविक अथवा भौतिक तापों का वर्णन अवश्य मिलता है।खण्डकाव्यों की श्रृंखला में गौरी, नहुष, राजेश्वरी, उर्वशी , अग्रपूजा अथवा कोविद कृत प्रतिशोध ही क्यों न हो ऐतिहासिक पात्रों के माध्यम से समाज को कवियों ने सदैव एक दिशा प्रदान की है।
खंडकाव्य की शृंखला में नई कड़ी के रूप जुड़ने वाले हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले की पावन भूमि श्री नैना देवी जी के आशीर्वाद से खिलते- खिलखिलाते, खुशियों से लहराते- लहलहाते गाँव डडोह निवासी कवि परमजीत सिंह कहलूरी का नाम मैंने काव्य जगत में बड़े स्नेही सृजनकारों में सुना है। उनके द्वारा सृजित सोरठा, नवगीत, आल्हा ,उल्लाला, चंद्रमणि, माहिया, सवैया आदि छंदों को पढने का अवसर प्राप्त हुआ है। अत्यंत सहज सृजनकार है। कवि की विशेष विशेषता यह है कि कवि कुछ दिन पूर्व ही आदरणीय गुरु देव संजय कौशिक विज्ञात जी द्वारा आविष्कृत कोविद छंद में इतनी शीघ्रता से खंडकाव्य का अंग बनाकर सुशोभित कर रहा है।यह श्लाघनीय है। एक शिक्षक की भूमिका में कवि बाल गोपाल के साथ-साथ समाज को शिक्षा प्रदान करने का बीड़ा उठाता है।
कहलूरी का हृदय परदुख कातरता से ओत-प्रोत दिखाई देता है। जब कवि ने देखा कि संसार में प्रतिदिन नारी को उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। नारी पर दुख के अंगार बरसते हैं। वह दग्ध हुई जा रही है तो कवि का हृदय द्रवित हो उठता है। स्वात: सुखाय को छोड़कर परहिताय का अनुसरण करता है। द्वापर युगीन द्रौपदी आज भी समाज से न्याय की माँग करती प्रतीत होती है। उस युग की नारी भी अपने अधिकारों तथा कर्तव्यों के प्रति सजग थी।अपनी अस्मिता के प्रति हुए खिलवाड़ को एक पल के लिए भी नहीं भूलना चाहती ।अपने केशों को खुला छोड़ कर लिंगभेदी समाज के सामने दृढ़ प्रतिज्ञा करती है कि जिन दूषित हस्तों ने इन्हें घसीटा है; अपमान में जंघा को पीटा है उनका टूटना ही मेरा न्याय है। कवि नारी को न्याय दिलवाने के लिए निरंतर साथ खड़ा है ।
दुर्योधन के दुष्कर्म वह चिंगारी हैं जो कौरव वंश को विनाश की लपटों में बदल देती है। लाक्षागृह को आग में झोंकने पर पांडव उन्हें क्षमा कर सकते हैं। किन्तु सभा में घसीट कर लाई द्रौपदी का चीरहरण करने जैसे जघन्य अपराध के बाद भी दौपदी चुप रहे ; प्रतिशोध ना लें ऐसा कैसे हो सकता है। खंडकाव्य को जब मैं पढ़ रही थी तो नारी का विलक्षण रूप सामने आ रहा था। कहीं मन द्रवित होता है कहीं सौंदर्य में सुनहरा ,और कहीं भौहों की तेगनुमा आकृति से युद्ध का बिगुल बज उठता है। समस्त खंड काव्य छह खंडों में विभक्त है। प्रत्येक खंड नारी के अतुलनीय रूप को प्रकट करता है। खंडकाव्य का शुभारंभ कवि कोविद छंद सौंदर्य- निरूपा खंड से किया है। प्रकृत खंडकाव्य में कवि ने विदुषी सवैया छंद के माध्यम से द्रोपदी की सुंदरता तथा मनोभावों का मनोहारी वर्णन किया है -
"द्रौपदी एक है नार सुंदर,
हठी देखती क्रोध भर नेत्र काले।
भींच के आँख रिपु की कुलाए,
स्वयं पीसती बार मन बोझ डालें।
प्रथम खंड को विभिन्नता नूतनता प्रदान करता है
द्यूत निमंत्रण खंड में कोविद सवैया का अनुपम रूप देखने को मिलता है
"कौन हरेगा पीर हृदय की सोच रहा है घोर अंधेरा ये
मान बचेगा चूक भले हो, केश खुले हैं मारुत घेरा ये
बैठ गए हैं पांडव वन में, कष्ट भरा है चार चफेरा ये
मौत चली वो आकर जाये, घूम रहे हैं जंगल डेरा ये
'प्रतिशोध' कथा प्रसंग की दृष्टि से
संवेदना की दृष्टि से
शब्द प्रयोग की दृष्टि से उत्कृष्ट खंडकाव्य है
कथा प्रसंग की दृष्टि से देखें तो द्यूत क्रीड़ा में पांडवों ने बारी-बारी सब कुछ दाव पर लगा दिया है। वैभव पूर्ण जीवन भिखारी सा प्रतीत होता है ।मन में उदासी छाई है। नीति अनीति में बदल चुकी है राजसभा का यह दृश्य पांडवों पर ही बिजली नहीं गिराता पाठक के हृदय पर भी वज्र आघात करता है।
' नीति का तांडव' ने पांडवों पर गाज गिरा दी है-
"बारी बारी दाग लगे सब,
कंटक बने तीर चुभाये।
कांसे पर जो बिजली गिरती,
उर पर पासा गिर जाये।
हार हुई है योद्धाओं की
नीति दिखाये भेद कहाँ।
'प्रतिशोध' कृति को लक्षण विधान की दृष्टि से देखें तो संवेदना के धरातल पर भी मानस मन को लाक्षणिकता से उद्वेलित करती है। प्रकृत खंडकाव्य में कौरवों ने नारी के प्रति संकुचित दृष्टिकोण रखा है।
द्वितीय खण्ड में नवगीत 'मन से हारी द्रोपदी' का निराशा भाव मन से हारी नारी को प्रतिबिंबित करता है ।
"वह रानी से होकर दासी,
कोस रहीं सब वीरों को।
नोच रही अपने तन से यूँ,
नश्तर जैसे तीरों को।
घेर रही है ज्वाला बहकी,
रीत बिगाड़े उपवन की।
-------------------
शब्द प्रयोग के अंतर्गत लक्षणा के शास्त्रीय प्रतिमानों का विवेचन तथा नवीन उद्भावनओं को सहेजा गया है। शब्द योजना में यत्र-तत्र लाक्षणिक पदावली को देखा जा सकता है।
तृतीय खंड में द्रौपदी प्रतिज्ञा लेती है-
" जग में अंधकार है,
जले भाव घुटती नारी।
काटे अंतस बुरा,
दिए घाव चलती आरी।।
चिल्ला कर क्रोध में,
प्रतिज्ञा सुता है पाती।
पियूंगी रक्त मैं,
दुशासन मुए की छाती।
लाएगा रक्त जो ,
वीर असली होगा।
मैंने इस द्यूत का, बुरा भार सारा भोगा।
खंड चार वनवास में गौणी लक्षणा का उदाहरण दृष्टव है जहाँ द्रोपदी सामान्य भाव से रहकर सब कार्य करती है अपने मनोबल से पांडवों को धीर बंधाती है; हिम्मत देती है किंतु हृदय में प्रतिशोध का भाव पल-पल उसे विकल रखता है। मतगयंद का उदाहरण कितना सुंदर है
वो गृहणी बनके मनभाव,
बनाकर भोजन भोग लगाती।
जंगल में कुटिया भर चाव,
मनोबल पांडव धैर्य बंधाती।
दो मुठ चावल का भर थाल,
सभी जनसेवक भोज कराती।
पाल रही मन में प्रतिशोध,
दिखावट से सब भाव छुपाती।
'महाभारत' खंड में कवि ने दर्शाया है कि अपने उद्देश्य पूर्ति में बाधक मूल्यों का विरोध करने की क्षमता नारी में सदा से रही है। सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, मानसिक, शोषण से मुक्ति का मार्ग दिखा कर स्वतंत्र अस्तित्व निर्मिति करना जानती है। यदि सहजता से माने तो उचित है ; अन्यथा उसे धरा को लाल करना आता है:-
"छाया धरा पर अंधेरा,
वैरी हुए आज भाई।
चारों तरफ रक्त बहता,
कैसे घड़ी आज आई।
प्राणों से प्यारे साथी ,
इक-इक सभी जा रहे हैं।
है लुट रही माँग ऐसे,
मिलके सभी आ रहे हैं।
मिट रहा हर एक अधर्मी,
हर जवानी यहाँ छा रही है।
समस्त खंड काव्य में स्त्री जीवन का संघर्ष अंकित है। अधिकार के प्रति चैतन्य है। स्त्री स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता का रूप 'प्रतिशोध का अंत' खण्ड में विज्ञात सवैया के माध्यम से देखने योग्य है ।
कृष्ण रे पीड़ा भरी आग में मैं हूँ, द्रौपदी का यह आलाप रोको।
मैं वही हूँ रे सखा आपकी प्यारी, भाव है सुंदर बेबाक टोको।
देखती हूँ देव जो ली प्रतिज्ञा है,
यूँ नहीं भर्म पाले द्वार झोंक।
ये प्रतिज्ञा तो चलो आज पूरी हो, रक्त को देख नहीं आज चौंको।
निम्न नवगीत की पंक्तियां समाज को द्यूत जैसे खेल से बचने का संदेश देती हैं । अपनी गलतियों के प्रति पश्चाताप की अभिव्यक्ति हैं -
" टंकार गांडीव जैसी,
शापित करती जीवन ।
भीम की गदा को देखो,
फूंक रही अंतर्मन ।
पांसो की यह गलती थी,
हर पल जाये खलती ।
निष्कर्षत: कहा जा सकता है कवि कोविद के खंडकाव्य में नूतन छंदों को पढ़ने में पाठक को विशेष आनन्द आएगा। कोविद छंद, कोविद सवैया विदुषी, विज्ञ, विज्ञात सवैया, मत्तगयंद, नव गीतों में बांधे गए रूपक पाठक को बांधे रहते हैं। लक्षणा की दृष्टि से समस्त गुण विद्यमान हैं। प्रतीकों तथा प्रचलित अलंकारों से कृति अलंकृत है ।कुछ स्थानों पर दूरुहता पाठकों को सोचने पर विवश करती है ,तो कुछ स्थानों पर भाषिक सहजता सरलता सीधे मन पर दस्तक देती है। कृति अनुपम, सुंदर प्रभावशाली है।सुंदर कृति प्रकाशन हेतु, विज्ञात प्रकाशन को तथा सुंदर सृजन के लिए कवि कोविद को हृदय से बधाई, साधुवाद।
डॉ० अनीता भारद्वाज 'अर्णव'
भारद्वाज- विला दहिया ऑटो केयर के सामने
दिल्ली बाईपास चरखी दादरी हरियाणा
द्रोपदी का प्रतिशोध (खंड काव्य) : नारी सब पर भारी -पर आदरणीय डॉ० अनीता भारद्वाज अर्णव द्वारा लिखी गई समीक्षा पढ़कर "कोविंद" जी के विलक्षण खंड काव्य का लघु चित्र उभर कर सामने आ गया।
ReplyDeleteअर्णव जी ने इतनी वृहद व्याख्यात्मक समीक्षा लिखी है कि खंड काव्य को पढ़ने की और पाठकों का ध्यान खींचा चला जायेगा। आदरणीया को इस अप्रतिम कार्य के लिए अनंत बधाईयां।
आदरणीय कोविद साहब ने अपने इस खंड काव्य पर जो मेहनत की है वो आ० अर्ण़व जी की समीक्षा में साफ झलक रहा है। नये आविष्कृत विविध छंदों के प्रयोग से खंड काव्य लिखकर उन्होंने अपनी विलक्षणता का स्पष्ट डंका बजा दिया है।
आदरणीय कोविद साहब को इस श्रमसाध्य खंड काव्य के सृजन के लिए हृदय तल से बधाई,और इस संग्रह की सफलता के लिए अनंत शुभकामनाएं।
आदरणीय अर्ण़व जी को पुनः बधाई एवं शुभकामनाएं।
कोविद जी की कलम जब भी चलती है उत्कृष्ट सृजन ही करती है। आपके खंड काव्य का विषय बहुत ही आकर्षक है। द्रोपदी का पूरा जीवन संघर्ष का प्रतीक रहा है जिसे आपने बहुत ही खूबसूरती से उकेरा है। विषय भले ही पुराना है परंतु कोविद छंद नया है और उसने चार चाँद लगा दिए 👌
ReplyDeleteआदरणीया अर्णव जी की जितनी तारीफ करें कम है ...बहुत ही शानदार समीक्षा 💐💐💐💐
श्रम साध्य समीक्षा के लिए आदरणीय अनीता भारद्वाज अर्णव जी का हृदय की गहराइयों से आभार व्यक्त करता हूं। आपकी समीक्षा पाकर संग्रह धन्य हुआ है। जितने श्रम और सहजता से मैंने इस संग्रह को पूर्ण किया है उतनी ही सहजता और श्रम से आपने इस संग्रह की समीक्षा की है।
ReplyDeleteआदरणीय गुरुदेव संजय कौशिक जी विज्ञात जी के स्नेही आशीर्वाद से इस संग्रह को पूरा करने का मौका मिला आदरणीय गुरुदेव को नमन करता हूं। आदरणीया नीतू ठाकुर विदुषी जी ने भी हौसला बढ़ाया है। मैं इनका भी आभार व्यक्त करता हूं। आदरणीय कुसुम कोठारी प्रज्ञा जी का टिप्पणी के माध्यम से हौसला बढ़ाने के लिए आभार व्यक्त करता हूं।
आशा करता हूं कि संग्रह है द्रौपदी का प्रतिशोध पाठकों को अवश्य पसंद आएगा।
धन्यवाद
अभी तक ऐसा सौभाग्य नहीं मिला है कि इस खंडकाव्य को पढ़ सकूं लेकिन इस समीक्षा को पढ़ने के बाद मानव पूरा का पूरा खंडकाव्य स्वयं अपनी कहानी बयां कर रहा हो।
ReplyDeleteसर्वप्रथम तो कभी को इतने सुंदर और मार्मिक विषय को चुनकर उस पर खंडकाव्य लिखने पर साधुवाद। आदरणीय आपका यह खंडकाव्य आने वाले समय में सभी सर्जकों साहित्य प्रेमियों आम जनमानस के लिए अवश्य ही एक अहम साहित्यिक सामाजिक ऐतिहासिक प्रेरणा का स्त्रोत बनेगा ऐसी मेरी आकांक्षा है।
आदरणीय डॉ अनीता भारद्वाज अरुण जी कि इस वृहद समीक्षा के लिए कुछ कहना सूर्य को दीपक दिखाने समान होगा परंतु फिर भी इतना जरूर कहूंगा कि आपकी समीक्षा ने इस खंडकाव्य के मर्म को पाठकों के सामने गागर में सागर के रूप में लाकर रख दिया है इसके लिए आपका बहुत-बहुत आभार एवं साधुवाद।
द्रौपदी का प्रतिशोध खंड काव्य के लिए सबसे पहले परमजीत सिंह जी को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं ।
ReplyDeleteइसका कवर पेज अत्यंत सटीक और सुंदर है जो पूरी पुस्तक का सार है ये चुनाव आपकी कल्पना शक्ति को दर्शाता है ।
आ0 अनिता अर्णव जी की समीक्षा ने पूरे इतिहास को और आज के परिपेक्ष्य में नारी की स्थिति और विनाश को बेहतर ढंग से सूक्ष्म अवलोकन कर रचनाकार की लेखनी को धन्य कर दिया ।
रचनाकार परमजीत सिंह जी के प्रशंशा के लिए शब्द नही
गुरुदेब द्वारा शोध किये हुए छन्द और सवैये में पूरा खंड काव्य लिखना और इतनी शीघ्रता से पूर्ण करना अचंभित करता है और मुझे प्रेरणा भी देता है ।
पुस्तक पढ़ने की उतकंठा बढ़ गयी है
मैं अति शीघ्र इसे मंगा कर पढ़ती हूँ
आ0 अनिता जी को सादर अभिवादन
और परमजीत जी आपके और खंडकाव्य के लिए हार्दिक शुभकामनाएं
बहुत सुंदर रचना
ReplyDeleteउत्कृष्ट रचना
ReplyDelete