Tuesday, December 21, 2021

छंद वर्ण के आँगन गूँजे : छंद रस अलंकार की अमूल्य निधि - समीक्षक कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

छंद वर्ण के आँगन गूँजे : छंद रस अलंकार की अमूल्य निधि - समीक्षक कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'
पुस्तक  "छंद वर्ण के आँगन गूँजे"  लेखक श्री संजय कौशिक विज्ञात जी।
आदरणीय विज्ञात जी की पुस्तक की समीक्षा कर सके इतना सामर्थ्य मेरी लेखनी में नहीं है पर पुस्तक पढ़कर उसके बारे में लिखने से स्वयं को नहीं रोक पाई ,चाहे पाठक इसे समीक्षा कहें चाहे मेरा पुस्तक के प्रति अनुराग।
कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा' 

छंद शास्त्र के पुरोधा, मनिषी, विज्ञ, मुर्धन्य हस्ताक्षर, श्री संजय कौशिक विज्ञात जी किसी परिचय के अपेक्षीत नहीं है।

उनके चरित्रगत गुण-
कर्मठता, दृढ़ निश्चय, हिन्दी भाषा के उपासक, प्रज्ञ, मेधावी, साहित्य समर्पित जीवन किसी से छुपे नहीं हैं।
हिन्दी भाषा के उत्थान और छंदों के पुनरुत्थान में उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया है।
इसी सोपान पर "छंद वर्ण के आँगन गूँजे"  पुस्तक आदरणीय संजय कौशिक विज्ञात जी द्वारा रचित ऐसा सृजन है जो छंद शास्त्र साहित्य के लिए अमूल्य धरोहर है।
इस  पुस्तक का अवतरण आदरणीय विज्ञात जी की श्रम साध्यता, प्रतिबद्धता, और अतुल्य ज्ञान कोष का परिणाम है।
उनकी अकिंचन्यता का एक उदाहरण - उन्होंने अपने सभी नवीन आविष्कृत 106 छंदों को अपने गुरु पिता-माता कुछ परिजन और बाकी अपने शिष्य शिष्याओं के नाम से नाम देकर उन्हें अपने मंच एंव शिक्षार्थियों को समर्पित कर दिए हैं ।

आपकी इस पुस्तक में हिंदी साहित्य के प्राचीन छंदों के साथ-साथ नवीन आविष्कृत छंदों के शिल्पों की बारिकी को सरल और सहज गति में विस्तार से उदाहरण सहित समझाया गया है ,सवैया शिल्प विधान और उनके रससिक्त उदाहरण, उनकी कल्पना शक्ति, देश और देश के सुरभित संस्कारों पर लिखे सवैयों की छटा देखते ही बनती है।
सुखी सवैया का एक अनुपम उदाहरण---

विधी का यह श्रेष्ठ विधान दिखे, ये देश दिखे अपना नित पावन।
सब हैं ऋतुएँ बस्ती जिसमें, यह हिन्द महान लगे मन भावन।
जब प्रीत बढ़े वह भी ऋतु है, कहते हम हैं जिसको सावन।
शुभ हैं गणना कहते वह भी,अपनी सुन ले सब एक इकावन।

साथ ही इस पुस्तक में लोक छंद, छंदों पर उनके शोध और नवीन अविष्कार किये गये छंद एंव उपजाति सवैया पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है।

काव्य जगत के लिए ये पुस्तक एक अमूल्य पुरस्कार है।

यह पुस्तक नवांकुरों के लिए साक्षात माँ शारदा का वरदान है।
इस में छंदों के शिल्प, मात्राभार रस,अलंकार और काव्य सृजन की समस्त विशेषताओं पर गहनता से प्रकाश डाला गया है और जो सभी एक ही जगह पर सरलता से स्थापित किए गये हैं।
पुस्तक सभी 11 रसों के साथ-साथ अलंकारों पर विस्तृत व्याख्यात्मक लेखा है, जो छंद लिखना सीखने वालों के लिए 
संजीवनी साबित होगा।

उनके द्वारा सृजित विशुद्ध हिंदी के सभी उदाहरण चमत्कृत करते हैं,उनकी भाषा का सौंदर्य बोध उनके उदाहरणों में सजीव हो उठा है, अलंकृत शब्द शक्ति स्वयं उनके लेखन का आभूषण है। 
उनकी ये पुस्तक गागर में सागर संजोने का अनुपम उदाहरण है।

अपनी छोटी "सुसंबद्ध "पुस्तक में उन्होंने एक ग्रंथ जैसी वृहद गठी हुई जानकारियांँ भर दी हैं।
जिस को पढ़कर हर कलमकार , शोधकर्ता, साहित्य कार, नवांकुर लाभ उठा कर काव्य लेखन में पारंगत हो सकता है।

"छंद वर्ण के आँगन गूँजे" 
काव्य अनुरागियों के लिए एक अमूल्य कृति है सीखने और सँवरने के इच्छुक साहित्य कारों को यह संग्रह अवश्य पढ़ना चाहिए।

यदि एक पंक्ति में कहूँ तो महत्व की दृष्टि से यह पुस्तक लेखकों के लिए और साहित्य के नवांकुरों के लिए बहुत ही लाभकारी है। 
प्रारंभ से लेकर अंत तक पुस्तक को पढ़ने के पश्चात बहुत सारी महत्वपूर्ण जानकारियों मिलेंगी और नवीन लेखकों को सम्पूर्ण दिशा निर्देश मिलेगा।
आदरणीय संजय कौशिक विज्ञात जी की ये पुस्तक समय का अमिट हस्ताक्षर है। 
मैं इस अमूल्य कृति के लिए आदरणीय संजय कौशिक विज्ञात जी को अनंत बधाई एवं हार्दिक शुभकामनाएं प्रेषित करती हूंँ।छंद वर्णन के आँगन गूँजे यहाँ से क्रय करें

उनकी इस पुस्तक की सफलता तो निश्चित है ही, ये पुस्तक सफलता के नये आयाम स्थापित करें।
पुनः बधाई एवं शुभकामनाएं 🌷🌷

कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा' 
मुम्बई महाराष्ट्र

Sunday, December 19, 2021

द्रोपदी का प्रतिशोध (खंड काव्य) : नारी सब पर भारी - डॉ० अनीता भारद्वाज अर्णव

द्रोपदी का प्रतिशोध खंड काव्य : नारी सब पर भारी - डॉ० अनीता भारद्वाज अर्णव 
द्रोपदी का प्रतिशोध : कवि परमजीत सिंह 'कोविद' कहलूरी
जब-जब समाज में मर्यादाओं की अवहेलना होती है धरती काँप उठती है अम्बर डोल उठता है ।मर्यादा हीन व्यक्ति की बौद्धिक आत्मिक एवं मानसिक शक्तियों का स्रोत विकृत हो जाता है। जब एक व्यक्ति अन्य की स्वतंत्रता का हनन करता है तब समाज भले ही उसे दंडित करे या ना करे किंतु हनित व्यक्ति का प्रतिशोध उसे विनाश के मार्ग पर ले जाता है। विशेषत:  नारी अस्तित्व पर बुरी नज़र डालने वाला व्यक्ति कभी सुरक्षित नहीं रह सकता। भले ही उसे सात तालों में बंद करके रखा जाए।
  साहित्यकारों ने सदा अपनी लेखनी के माध्यम से समाज को आईना दिखया है। रुचि अनुसार गद्य अथवा पद्य में  अनेक विषयों को रोचक शैली में अंकित किया है।काव्य की अनेक विधाओं में  खंडकाव्य विशेष पक्ष को आलौकित करती विधा है ।खण्डकाव्य में नायक अथवा नायिका के दैहिक, दैविक अथवा भौतिक तापों का वर्णन अवश्य मिलता है।खण्डकाव्यों की श्रृंखला में गौरी, नहुष, राजेश्वरी, उर्वशी ,  अग्रपूजा अथवा कोविद कृत प्रतिशोध  ही क्यों न हो ऐतिहासिक पात्रों के माध्यम से समाज को कवियों ने सदैव एक दिशा प्रदान की है।
खंडकाव्य की  शृंखला में नई कड़ी के रूप  जुड़ने वाले  हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले की पावन भूमि श्री नैना देवी जी के आशीर्वाद से खिलते- खिलखिलाते, खुशियों से लहराते- लहलहाते गाँव डडोह निवासी कवि परमजीत सिंह कहलूरी का नाम मैंने काव्य जगत में बड़े स्नेही सृजनकारों में सुना है। उनके द्वारा सृजित सोरठा, नवगीत, आल्हा ,उल्लाला, चंद्रमणि, माहिया, सवैया आदि छंदों को पढने का अवसर प्राप्त हुआ है। अत्यंत सहज सृजनकार है। कवि की विशेष विशेषता यह है कि कवि कुछ दिन पूर्व ही आदरणीय गुरु देव संजय कौशिक विज्ञात जी द्वारा आविष्कृत कोविद छंद में इतनी शीघ्रता से  खंडकाव्य का अंग बनाकर सुशोभित कर रहा है।यह श्लाघनीय है। एक शिक्षक की  भूमिका में कवि  बाल गोपाल के साथ-साथ समाज को शिक्षा प्रदान करने का बीड़ा उठाता है। 

कहलूरी का हृदय परदुख कातरता से ओत-प्रोत दिखाई देता है। जब कवि ने देखा कि संसार में प्रतिदिन नारी को उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। नारी पर दुख के अंगार बरसते हैं। वह दग्ध हुई जा रही है तो कवि का हृदय द्रवित हो उठता है। स्वात:  सुखाय को छोड़कर परहिताय का अनुसरण करता है। द्वापर युगीन द्रौपदी आज भी समाज से न्याय की माँग करती प्रतीत होती है। उस युग की नारी भी अपने अधिकारों तथा कर्तव्यों के प्रति सजग थी।अपनी अस्मिता के प्रति हुए खिलवाड़ को एक पल के लिए भी नहीं भूलना चाहती ।अपने केशों को खुला छोड़ कर लिंगभेदी  समाज के सामने दृढ़ प्रतिज्ञा करती है कि जिन दूषित हस्तों ने इन्हें घसीटा है; अपमान में जंघा को पीटा है उनका टूटना ही मेरा न्याय है। कवि नारी को न्याय दिलवाने के लिए  निरंतर साथ खड़ा है ।


दुर्योधन के दुष्कर्म वह चिंगारी हैं जो कौरव वंश को विनाश की लपटों में बदल देती है। लाक्षागृह को आग में झोंकने पर पांडव उन्हें क्षमा कर सकते हैं। किन्तु सभा में घसीट कर लाई द्रौपदी का चीरहरण करने जैसे जघन्य अपराध के बाद भी दौपदी चुप रहे ; प्रतिशोध ना लें ऐसा कैसे हो सकता है। खंडकाव्य को जब मैं पढ़ रही थी तो नारी का  विलक्षण रूप सामने आ रहा था। कहीं मन द्रवित होता है कहीं सौंदर्य में सुनहरा ,और कहीं भौहों की तेगनुमा आकृति से युद्ध  का बिगुल बज उठता है।  समस्त खंड काव्य छह खंडों में विभक्त है। प्रत्येक खंड नारी के अतुलनीय रूप को प्रकट करता है। खंडकाव्य का शुभारंभ कवि कोविद छंद सौंदर्य- निरूपा खंड से किया है। प्रकृत खंडकाव्य में कवि ने विदुषी सवैया छंद के माध्यम से द्रोपदी की सुंदरता तथा मनोभावों का मनोहारी वर्णन किया है -
"द्रौपदी एक है नार सुंदर,
 हठी देखती क्रोध भर नेत्र काले।
 भींच के आँख रिपु की कुलाए,
 स्वयं पीसती बार मन बोझ डालें।
 प्रथम खंड को विभिन्नता नूतनता प्रदान करता है  

द्यूत निमंत्रण खंड में कोविद सवैया का अनुपम रूप देखने को मिलता है

"कौन हरेगा पीर हृदय की सोच रहा है घोर अंधेरा ये
मान बचेगा चूक भले हो, केश खुले हैं मारुत घेरा ये
 बैठ गए हैं पांडव वन में, कष्ट भरा है चार चफेरा ये
 मौत चली वो आकर जाये, घूम रहे हैं जंगल डेरा ये

 'प्रतिशोध' कथा प्रसंग की दृष्टि से   
संवेदना की दृष्टि से 
शब्द प्रयोग की दृष्टि से उत्कृष्ट खंडकाव्य  है 
कथा प्रसंग की दृष्टि से देखें तो द्यूत क्रीड़ा में पांडवों ने बारी-बारी सब कुछ दाव पर लगा दिया है। वैभव पूर्ण जीवन भिखारी सा प्रतीत होता है ।मन में उदासी छाई है। नीति अनीति में बदल चुकी है राजसभा का यह दृश्य पांडवों पर ही बिजली नहीं गिराता पाठक के हृदय पर भी वज्र आघात करता है।
' नीति का तांडव' ने पांडवों पर गाज गिरा दी है-

 "बारी बारी दाग लगे सब,
 कंटक बने तीर चुभाये।
 कांसे पर जो बिजली गिरती,
 उर पर पासा गिर जाये।
 हार हुई है योद्धाओं की
 नीति दिखाये भेद कहाँ।
 'प्रतिशोध' कृति को लक्षण विधान की दृष्टि से देखें तो संवेदना के धरातल पर भी मानस मन को लाक्षणिकता से उद्वेलित करती है। प्रकृत खंडकाव्य में कौरवों ने नारी के प्रति संकुचित दृष्टिकोण रखा है।
 द्वितीय खण्ड में नवगीत 'मन से हारी द्रोपदी' का निराशा भाव  मन से हारी नारी को प्रतिबिंबित करता है ।

"वह रानी से होकर दासी,
कोस रहीं सब वीरों को।
 नोच रही अपने तन से यूँ,
 नश्तर जैसे तीरों को।
 घेर रही है ज्वाला बहकी,
 रीत बिगाड़े उपवन की।
      -------------------
 शब्द प्रयोग के अंतर्गत लक्षणा के शास्त्रीय प्रतिमानों का विवेचन तथा नवीन उद्भावनओं को सहेजा गया है। शब्द योजना में यत्र-तत्र लाक्षणिक पदावली को देखा जा सकता है।

 तृतीय खंड में द्रौपदी प्रतिज्ञा लेती है-
" जग में अंधकार है,
 जले भाव घुटती नारी।
 काटे अंतस बुरा,
दिए घाव चलती आरी।।
 चिल्ला कर क्रोध में,
  प्रतिज्ञा सुता है पाती।
 पियूंगी रक्त मैं,
 दुशासन मुए की छाती।
 लाएगा रक्त जो ,
वीर असली होगा।
 मैंने इस द्यूत का, बुरा भार सारा भोगा।
 खंड चार वनवास में गौणी लक्षणा का उदाहरण दृष्टव है जहाँ द्रोपदी सामान्य भाव से रहकर सब कार्य करती है अपने मनोबल से पांडवों को धीर बंधाती है; हिम्मत देती है किंतु हृदय में प्रतिशोध का भाव पल-पल उसे विकल रखता है। मतगयंद का  उदाहरण कितना सुंदर है
 वो गृहणी बनके मनभाव,
 बनाकर भोजन भोग लगाती।
 जंगल में कुटिया भर चाव,
 मनोबल पांडव धैर्य बंधाती।
 दो मुठ चावल का भर थाल,
 सभी जनसेवक भोज कराती।
 पाल रही मन में प्रतिशोध,
 दिखावट से सब भाव छुपाती।

 'महाभारत' खंड में कवि ने दर्शाया है कि अपने उद्देश्य पूर्ति में बाधक मूल्यों का विरोध करने की क्षमता नारी में सदा से रही है। सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, मानसिक, शोषण से मुक्ति का मार्ग दिखा कर स्वतंत्र अस्तित्व निर्मिति करना जानती है। यदि सहजता से माने तो उचित है ; अन्यथा उसे धरा को लाल करना आता है:-
"छाया धरा पर अंधेरा,
 वैरी हुए आज भाई।
 चारों तरफ रक्त बहता,
 कैसे घड़ी आज आई।
 प्राणों से प्यारे साथी ,
इक-इक सभी जा रहे हैं।
 है लुट रही माँग ऐसे,
 मिलके सभी आ रहे हैं।
 मिट रहा हर एक अधर्मी,
 हर जवानी यहाँ छा रही है।
 समस्त खंड काव्य में स्त्री जीवन का संघर्ष अंकित है। अधिकार के प्रति चैतन्य है। स्त्री स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता का रूप 'प्रतिशोध का अंत' खण्ड में विज्ञात सवैया के माध्यम से देखने योग्य है ।
कृष्ण रे पीड़ा भरी आग में मैं हूँ, द्रौपदी का यह आलाप रोको।
 मैं वही हूँ रे सखा आपकी प्यारी, भाव है  सुंदर बेबाक टोको।
 देखती हूँ देव जो ली प्रतिज्ञा है,
 यूँ नहीं भर्म पाले द्वार झोंक।
 ये प्रतिज्ञा तो चलो आज पूरी हो, रक्त को देख नहीं आज चौंको।


निम्न नवगीत की पंक्तियां  समाज को  द्यूत जैसे खेल से बचने का संदेश देती हैं । अपनी गलतियों के प्रति पश्चाताप की अभिव्यक्ति हैं -
" टंकार गांडीव जैसी,
 शापित करती जीवन ।
भीम की गदा को देखो,
 फूंक रही अंतर्मन ।
पांसो की यह गलती थी,
 हर पल जाये खलती ।

निष्कर्षत: कहा जा सकता है कवि कोविद के खंडकाव्य में नूतन छंदों को पढ़ने में पाठक को विशेष आनन्द आएगा। कोविद छंद, कोविद सवैया विदुषी, विज्ञ, विज्ञात सवैया, मत्तगयंद, नव गीतों में बांधे गए रूपक पाठक को बांधे रहते हैं। लक्षणा की दृष्टि से समस्त गुण विद्यमान हैं। प्रतीकों तथा प्रचलित अलंकारों से कृति अलंकृत  है ।कुछ स्थानों पर दूरुहता  पाठकों को सोचने पर विवश करती है ,तो कुछ स्थानों पर भाषिक सहजता सरलता सीधे मन पर दस्तक देती है। कृति अनुपम, सुंदर प्रभावशाली है।सुंदर कृति प्रकाशन हेतु, विज्ञात प्रकाशन को तथा सुंदर सृजन के लिए कवि कोविद को हृदय से बधाई, साधुवाद।


डॉ० अनीता भारद्वाज 'अर्णव'
 भारद्वाज- विला दहिया ऑटो केयर के सामने 
दिल्ली बाईपास चरखी दादरी हरियाणा

Thursday, December 16, 2021

मन की वीणा : "नवगीतों के स्वर्णकाल से तप कर निकले कुंदन..." - समीक्षक अचला शर्मा

मन की वीणा यहाँ से खरीदें


मन की वीणा : "नवगीतों के स्वर्णकाल से तप कर निकले कुंदन..." - समीक्षक अचला शर्मा 
मन की वीणा - कवयित्री कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'
कवयित्री कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा' के सतत सृजन का प्रकाशित परिणाम द्वितीय संकलन मन की वीणा नवगीत-गीत संग्रह विज्ञात प्रकाशन से  प्रकाशित हो रहा है। विज्ञात नवगीत माला में शतकवीर नवगीत सम्मान प्राप्त 'प्रज्ञा' द्वारा इस संग्रह में 150 रचनाओं को सम्मिलित किया गया है। सभी रचना अपने आप में उत्कृष्ठ एवं अनुपम हैं। कवयित्री का लेखन कौशल और सृजनात्मक शैली के दृश्य देखते ही बनते हैं इन रचनाओं के सृजन में मुख्य आधार स्तम्भ छायावाद ही है। प्रतीकात्मक शैली में लिखी गई सभी रचनाएं अपने आप में अपनी उत्तमता के स्वर आलापती हैं। प्रस्तुत रचनाओं में अलंकारों की छटा भी अनायास ही झंकृत वीणा के स्वरों सी गुंजायमान होकर मधुमास का वातावरण निर्मित कर मंत्र मुग्ध कर साक्षात मोहिनी के पाश का कार्य करती प्रतीत होती हैं।
       शीर्षक 'कविता प्रिये' में सर्व प्रथम लिखा गया मुखड़ा है 

मन में जब अनुराग जगा था
मूरत इक साकार प्रिये।।

'कविता प्रिये' यह आकर्षक शीर्षक पर्याप्त है यह दर्शाने के लिए कि इस रचना में कवयित्री ने किस तरह भावनात्मक रूप से कथ्य को स्पष्ट किया है। और इस भावपूर्ण रचना अर्थात नवगीत को प्रिये संबोधन से अलंकृत किया है प्रिये संबोधन के चलते मानो प्रेयसी की भांति नवगीत जीवंत हो उठा है। मानो कवयित्री मन प्रेमी की तरह अपनी कविता से संवाद कर रहा प्रतीत होता है। इस प्रकार से यह एक श्रेष्ठ नवगीत का मुखड़ा पढ़ा गया है।

अब इसी रचना का एक अन्तरा भी देखते हैं 

तुम ही मेरी शैल गवरजा
चपल मोहिनी अरु ललिता
मानस में ऐसे रमती ज्यों 
क्षीर नीर सी हो सरिता


प्रथम अन्तरे में कवयित्री प्रेमी रूप में अपनी प्रेयसी कविता के सौंदर्य रूप और पावनता के चरित्र का वर्णन करता है। जिस सुंदर रूप ने मोहिनी सा मुग्ध कर लिया है। और उसके गुण चंचल शीतल सरिता के समान बताते हुए सशक्त भावाव्यक्ति प्रस्तुत की गई है।

अब इसी अन्तरे की पूरक पंक्ति भी देखते हैं 
बसा गुहा अंतस में रखलूं
सदा रहो अविकार प्रिये।।
सभी अच्छे गुण देखकर इस मोहिनी मूरत को अपने अंतस में प्रस्थापित करने की बात करता है।ऐसे में भी वह प्रेमी अपनी प्रेयसी से सभी विकारों से दूर रहने की अपेक्षा करता हुआ दर्शाया गया है। ऐसे में भाव प्रधान यह रचना नव्यता को धारण किये हुए है यह रचना प्रतीकात्मक शैली छायावाद का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।

कवि हृदय अपने आस पास के दृश्य बिम्ब को देखता है तब बहुत कुछ सीखता है और प्रकृति के अनेक दृश्य उसके कोमल हृदय को झकझोर देते हैं वह आहत हुआ उनसे वार्तालाप करता है तो कभी वे दृश्य साथ चलते प्रतीत होते हैं ऐसा ही एक दृश्य कवयित्री कुसुम कोठारी प्रज्ञा द्वारा 'शर्वरी का सौंदर्य' शीर्षक से लिखे गए नवगीत का मुखड़ा देखें 

चाँद झुकता शाख पर ज्यों 
फूल का मुख चूमता सा 
साथ में सपने सुहाने 
विश्व सारा घूमता सा।। 

प्रस्तुत रचना के मुखड़े में दृश्य बिम्ब के माध्यम से रात्रि में उदित चंद्रमा की छोटी छोटी क्रिया में सजीवता का आभास कवयित्री के हृदय ने किया तो उस आभास को लेखनी के माध्यम से नवगीत के रूप में पृष्ठ पर उकेरा तब यह दृश्य चित्र के रूप में पाठक के समक्ष स्वयं ही आकर खड़ा हो जाता है। इस प्रकार प्रतीकात्मक शैली में लिखा प्रेमरस पर आधारित यह नवगीत जिसमें चाँद और पुष्प के मधुर मिलन को दर्शाया गया है। कल्पना लोक में विचरण करता प्रेमी मन एक स्थान पर बैठे-बैठे ही पूरे विश्व का भ्रमण कर लेता है।

कवयित्री कुसुम कोठारी प्रज्ञा द्वारा सृजित इसी रचना का अन्तरा भी देखें ... 

राग छाया पात पल्लव 
जागता अनुराग धानी 
भीगती है ओस कण में 
सिमटती है रात रानी 
प्रेम के प्रस्फुटितकरण के अद्भुत क्षण शर्वरी में बिखरी धवल चाँदनी से अंकुरित होकर तरु के पात-पात पर बिखर जाती है उसी प्रकार से अनुराग का प्रभाव कण-कण में दिखाई देता है।  समूची सृष्टि नव शृंगार किये हुए धानी रंग में रंगी प्रतीत होती है। शर्वरी में भीगती ओस से सिमटती ओस की बूंदें वातावरण की ठंड का आभास दे रही हैं 

और अब इस रचना की पूरक पंक्ति की भावाभिव्यक्ति देखें 
और मतवाला भ्रमर भी 
आ गया है झूमता सा।।

शर्वरी में चाँदनी और ओस के कण के चलते रातरानी की सुगंध वातावरण में चहुँदिश अपना प्रभाव दिखा रही है ऐसे मनोहारी आकर्षक परिवेश में भंवरा भी भ्रामित होकर अपने स्वभाव के विपरीत रात्रि में झूमता हुआ उस अलौकिक वातावरण से आनंदित हुआ दिखाई पड़ता है। इस प्रकार से श्रेष्ठ भावाभिव्यक्ति प्रस्तुतिकरण कहा जा सकता है

नव्यता को धारण किये हुए और प्रदत्त प्रतीक के माध्यम से अपनी बात को काव्य रूप में कह देने में सिद्ध हस्त लेखनी की धनी कुसुम कोठारी प्रज्ञा की भाषा शैली स्पष्ट, क्लिष्ट हिन्दी शब्दों के प्रयोग से नवगीत का रूप सुदृढ करता है। तुकांत देखने में प्रायः उत्तम चयन किये गए हैं जबकि कहीं-कहीं साधारण स्तर के तुक भी देखने को मिले हैं भाव पक्ष उत्तम और श्रेष्ठ कहा जा सकता है जबकि कहीं-कहीं श्रेष्ठता और भी अधिक हो सकती है। उपमा उत्प्रेक्षा रूपक सहित मानवीकरण जैसे ढेरों अलंकारों का प्रयोग कवयित्री की सशक्त लेखनी में अनायास ही रमे हुए हैं जिनकी झलक पाठक वर्ग को इस संग्रह में देखने को बहुतायात मिलेगी। 
सुंदर नवनवेली दुल्हन के साथ में वीणा के चित्र से 'मन की वीणा' संग्रह के नाम के सौंदर्य के साथ न्याय करता है जिसका समर्पण कवयित्री ने अपनी माँ को समर्पित किया है शुभकामना संदेश से राज कमल कोठारी ने चार चांद लगा दिए हैं और भूमिका में नीतू ठाकुर विदुषी ने कवयित्री की सशक्त लेखनी से परिचित करवाया है अनुक्रमणिका कवयित्री के वृहत सृजन का परिचय देती है। फिर शुरू होती है यात्रा रचना पढ़ने की जो साधारण जन मानस को भी पूर्ण आनंदित करेगी और साहित्यिकता के मापदण्ड पर भी पूर्णतया खरी उतरेगी। 
कवयित्री कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा' का यह द्वितीय संग्रह कवयित्री को साहित्यकारों में सम्मिलित करवाने के लिए जाना जा सकेगा इसी विश्वास के साथ कवयित्री कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा' को उनकी साहित्यिक यात्रा के लिए अनंत बधाई एवं शुभकामनाएं 

अचला शर्मा 
समालखा पानीपत 
हरियाणा 132 101

विदुषी व्यंजना : शब्द शक्ति की गंगोत्री से उद्गम अनुपम नवगीत संग्रह - समीक्षक अचला शर्मा

विदुषी व्यंजना : शब्द शक्ति की गंगोत्री से उद्गम अनुपम नवगीत संग्रह - समीक्षक अचला शर्मा 

विदुषी : व्यंजना - कवयित्री नीतू ठाकुर 'विदुषी' 


विदुषी की रचना मेरी दृष्टि में .... 
अचला शर्मा 


विज्ञात नवगीत माला के नवगीत शतकवीर कार्यक्रम से प्रस्फुटित नवगीतों की यह धारा ठीक उसी प्रकार से निरन्तर कल्याणकारी विदुषी : व्यंजना यहाँ से खरीदें है जिस प्रकार से  बहती हुई एक नदिया शीतल जल प्रवाह के सहारे समस्त मानव जाति का कल्याण करती हुई निरन्तर प्रवाहित होती रहती है। ऐसे में कविजन उस नदिया की कल-कल की ध्वनि से वार्तालाप करते हैं तो कभी उस कल-कल की ध्वनि में छिपे काल की तरह निरन्तर बढ़ते रहने के संदेश सुन कर अपनी कविताओं के माध्यम से पाठक वर्ग को रोमांचित कर देते हैं 
 ऐसे में कवयित्री नीतू ठाकुर 'विदुषी' का संग्रह विदुषी : व्यंजना उस नदिया के जीवन अर्थात यात्रा काल में आने वाली परेशानी को सुनकर नदिया के त्रस्त हृदय की व्यथा को और किसी भी पर्व पर समाज द्वारा मानाये जाने वाले हर्ष में भी उस पर्व का कष्ट अपने चित्रित बिम्ब के माध्यम से अपनी काव्य शैली में उकेर कर व्यथित हृदय की व्यंजना के चलचित्र दर्शाने में सफल प्रयोग कर देती हैं। विज्ञात प्रकाशन के माध्यम से प्रकाशित विदुषी : व्यंजना (नवगीत-गीत संग्रह) में कवयित्री ने व्यंजना की एक नई परम्परा को जन्म देकर सिद्ध कर दिखाया है कि कवि मन कल्पनाओं के क्षितिज में और ऊँचा उड़ सकता है। अपने निकटतम वातावरण में संभावित संभावनाओं के घटित होने की प्रक्रिया में उन्हें पूर्णतया बलवती करके साक्षात आकार देते हुए कवि हृदय काव्य की परम्परा को सदैव निभाते आये हैं। नई कविता नव्यता के सुनहरी वस्त्र धारण कर कुंदन सी कायामय मनोहारी आकर्षक का केंद्र मोहिनी अप्सरा से भी बढ़कर होती है। प्रदत्त बिम्ब के माध्यम से सशक्त कथन इसकी पहचान कही जाती है मुहावरे युक्त कथ्य इस विधा के सौंदर्य में चार चांद लगा देते हैं। और कोमल हृदय से शब्द शक्ति व्यंजना का प्रवाह कवयित्री नीतू ठाकुर 'विदुषी' की रचनाओं में मुख्य केंद्र बिंदु रहता है 'चील अनिष्ट ले मंडराई' शीर्षक से लिखी गई रचना के मुखड़े के माध्यम से कवयित्री कहती हैं देखें ...

टूट रही थी श्वास डोर जब
चील अनिष्ट ले मंडराई
घूम रहे थे धरती अम्बर
या निर्धनता की खाई

भाव यह है कि विपदाएँ जब आती हैं तो चारों दिशाओं से ही आती हैं। जिसमें मनुष्य स्वयं को लाचार तथा असहाय महसूस करता है। विपदाएँ तो प्रत्येक मनुष्य के जीवन का हिस्सा हैं। पर निर्धन व्यक्ति के जीवन में इनकी संख्या कुछ अधिक अवश्य देखी जाती है। जैसे छोटी-छोटी खुशियों के लिये भी साधारणतया लोगों को अनेक प्रकार के मूल्य चुकाने पड़ते हैं। ऐसे ही हर आशंका एक नई विपदा की सूचना देती हुई सी प्रतीत होती है और भयभीत मन को ढांढस बंधाना कठिन और दुष्कर कहा जाता है। तो ऐसे में अनेक भ्रांतियां बन जाती हैं कि अपने दूर हैं या अपने सौभाग्य की दूरी किसी खाई के चलते और अधिक दूर दिख रही है ... 

लाशों के अंबार लगे है
भोज करे कुत्ता टोली
एक बूंद पानी को तरसे
पयो लगे विष की गोली

वीभत्स रस पर आधारित यह रचना अपना परिचय स्वयं देती है इस अंतरे में कवयित्री नीतू ठाकुर विदुषी के द्वारा दृश्य बिम्ब पर लिखे गए भावयुक्त सृजन की गाथा भी भली भांति कह देने में सक्षम और समर्थ है। कवयित्री कहती हैं कि कभी-कभी मनुष्य को ऐसे भयावह दृश्यों का सामना करना पड़ जाता है जिनकी कल्पना उसने कभी स्वप्न में भी नही की होती। स्वार्थ के वशीभूत होकर डूबती हुई मनुष्य जाति, मानव-धर्म को भूलकर अपने लालच वश मृत्यु के दूत बन अपने ही भाई बंधुओं के प्राणों का हरण कर रहे हैं। अपने लालच के चलते किसी प्यासे की प्यास बुझाने के स्थान उन्हें तरसाया जाता है। अब पूरक पंक्ति में कवयित्री कहती हैं कि मनुष्य के अंदर की मानवता नष्ट हो जाती है तब .....
पवन चली दुर्गंध समेटे
हाड़ माँस की चिकनाई।।
ऐसे दृश्य को प्रकृति देखती है तो वह भी क्रुद्ध होकर मनुष्य का साथ छोड़ती सी दिख रही है। वातावरण में हाड़ मास की दुर्गंध इस तरह से समाहित है कि श्वास लेना भी दूभर हो चला है। शुष्क कंठ के चलते चिकनाई का स्रोत एक बूँद जल की है उसके लिए भी यह जीवन तड़पता सा प्रतीत होता है और वह जीवन मृत्यु की याचना करता है।

'आपका आभास' शीर्षक से सृजन की गई रचना के मुखड़े में कवयित्री प्रेम विषय पर अपनी लेखनी का परिचय देती हुई कहती हैं कि...

फिर पलक झुक कर निहारे
आपका आभास पाकर।
गूँजती है मौन वाणी
फिर अधूरा गीत गाकर।।

प्रेम एक अबूझ पहेली जैसा है रहस्यमयी अनुभव है जिसकी गहराई का अनुमान लगाना अत्यंत कठिन तथा दुष्कर कार्य कहा गया है। प्रेम कभी अकेला जन्म नही लेता अपने साथ अनेक भाव लेकर उपजता है। परंतु उसके सबसे निकट करुण रस है जो विरह से जन्म लेता है। अपने प्रिय को अपने निकट रखने की चाह में मन भ्रामक कल्पनाएँ करने लगता है। भ्रम लोक में विचरण करते हुए कुछ क्षण के लिए ही सही पर नायिका अपने सभी दुख भूल कर बीते हुए मिलन के क्षणों की स्मृति से विशेष आनंद की अनुभूति करती है जिस कारण उसके ह्रदय की धड़कनों के वाद्य यंत्र पर उसके अधर स्वयं कोकिला से गीत गुनगुनाने लगते हैं। गूँजती है मौन वाणी विरोधाभास का जीवंत उदाहरण है इसी रचना के अन्तरे में कवयित्री कहती हैं 

अंतरे में तुम समाये
गीत की रसधार फूटी
तन बिना मन के मिलन से
इस जगत की रीत टूटी

विरह अग्नि में जलते व्यथित हृदय में जब गीत प्रस्फुटित होता है तो उसके हर शब्द में सिर्फ उसके मनमीत की छवि होती है। प्रेम रस से सम्पूर्ण वातावरण सुगंधित हो लाखों योजन की दूरी को क्षणमात्र में मिटा देता है। कवयित्री ने ये क्षणिक यात्रा स्वप्न लोक की कही है क्योंकि मन से मन के मिलन का संबंध इतना प्रगाढ़ होता है कि बिना किसी औचारिक मिलन के भी वो स्वयं में सम्पूर्ण है। और पूरक पंक्ति में भी भाव ज्यों के त्यों बने हुए हैं विरह रस को विरोधाभास से जीवंत कर दिया है... 
मोड़ते हैं मुख जहाँ से
हम दुखों पर मुस्कुराकर।।
सामाजिक रीतियाँ मनुष्य के शुद्र तन पर प्रतिबंध लगा सकती है। इन प्रतिबंधों को भी कवयित्री ने सम्मान की दृष्टि से देखते हुए प्रेयसी को आत्मीय सुख की अनुभूति के चलते स्वयं को मोड़ लेने की बात स्वीकार की है। और प्रेम अपनी चरम सीमा पर हो तो त्याग में ही महानता दर्शाने का प्रयास किया है इससे स्पष्ट है कि कवयित्री सामाजिक परंपराओं का निर्वहन करने में सक्षम और समर्थ है।

फूल से चुभने लगे है
शुष्क से क्यों नेत्र मेरे
तैरते हैं आँसुओं में
जब पिघलते स्वप्न तेरे

कल्पनाओं के भ्रम का जाल जब टूटता है और यथार्थ की अँधेरी परछाई मन मस्तिष्क को घेर लेती है तब कोमल पुष्प भी नेत्रों को चुभने लगते हैं। अपने प्रिय को खो देने का भय जब हृदय में व्याप्त होता है नैनों में समाये स्वप्न मोम की भाँति पिघलकर आँसुओं संग बहते दिखाई देते हैं।

पूछ लो कैसे बिताये
बिन तुम्हारे वर्ष आकर।।

प्रेम भरा संसार जब मिटाता हुआ दिखाई देता है तब मिलन की उत्कंठा बढ़ती है और मन चाहता है कि उसके मीत तक उसकी दारुण दशा का हाल पहुँचे।
 
इस प्रकार से करुण, प्रेम, वीभत्स वीर रस सहित बहुरसों तथा उपमा, उत्प्रेक्षा, यमक, अनुप्रास और मानवीकरण अन्योक्ति सहित  अनेक अलंकारों की छटा पूरे संकलन को पठन योग्य बनाती हैं। 113 गीत-नवगीत का यह संकलन पाठक वर्ग के लिए प्रत्येक रचना के गहनतम विचारों से कल्पना के अद्भुत क्षितिज की यात्रा करवाता हुआ दिखाई देगा। विज्ञात प्रकाशन के माध्यम से प्रकाशित सुंदर और आकर्षक आवरण जिस पर स्वयं कवयित्री का चित्र अंकित है इस पृष्ठ का सौंदर्य निखार रहा है। अंतिम पृष्ठ पर कवयित्री का संक्षिप्त जीवन परिचय है 15 साल के निरन्तर लेखन के पश्चात प्रथम एकल संकलन निश्चित ही परिक्व काव्य सृजन के दर्शन करवाने का एक उत्तम माध्यम यह संकलन कहा जा सकता है। समर्पण गुरु के पश्चात शुभकामना संदेश ....  तथा भूमिका बाबूलाल शर्मा बौहरा 'विज्ञ' द्वारा लिखित है कवयित्री की लेखनी से लेख में कवयित्री ने पाठक वर्ग को संग्रह से परिचित करवाया है।  तत्पश्चात अनुक्रमणिका से यात्रा प्रारम्भ होती है विदुषी : व्यंजना नवगीत-गीत संग्रह की जो कवयित्री को साहित्यिक पृष्ठभूमि से जोड़ती दिखाई देगी। संग्रह में भाषा शैली सरल स्पष्ट है बिम्ब के माध्यम से कथ्य को सुदृढ बनाया गया है हालांकि सपाट कथन की उपास्थिति भी देखी जा सकती है। कुछ रचनाओं में तुक बंदी उत्तम से श्रेष्ठ हो सकती हैं कुछ रचनाओं में स्वछंद सावधानी से निभाये जा सकते थे भावपक्ष उत्तम है कथ्य में नव्यता के प्रयास श्रेष्ठ हैं कवयित्री नीतू ठाकुर विदुषी द्वारा प्रारम्भ की गई यह साहित्यिक यात्रा इनके साहित्यकार बनने तक अवश्य चलती रहे और साहित्य जगत कवयित्री को स्वीकार कर साहित्य जगत में स्थान अवश्य दे इन्ही शुभकामनाओं के साथ आज की लेखन यात्रा को विराम।

अचला शर्मा 
समालखा पानीपत 
हरियाणा 132101

Wednesday, December 15, 2021

देहरी गाने लगी : नव्यता के स्वर्ण पदक धारे नवगीत - डॉ० अनीता भारद्वाज 'अर्णव'

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"देहरी गाने लगी" नव्यता के स्वर्ण पदक धारे  नवगीत - डॉ० अनीता भारद्वाज 'अर्णव'

देहरी गाने लगी - अनिता सुधीर आख्या 

"देहरी गाने लगी" कवयित्री अनिता सुधीर आख्या के नवगीतों का संग्रह है। विज्ञात नवगीत माला के शतकवीर कार्यक्रम से निर्मित यह संकलन एक सशक्त नवगीत संकलन है। जीवन के गणित से परिस्थितियों का जमा, घटा, गुणा भाग कर एक सुलझी हुई जीवन शैली में पदार्पण करती हैं।आख्या जी की विभिन्न विषयों पर आधारित रचनाएं छन्द आधारित संग्रह में आसानी से देखी जा सकती है।नवगीतों के माध्यम से  समाज व मानवता का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया गया है।इनके माध्यम से कर्मपथ पर बढ़ते हुए नए अनुभव साझा किए गए हैं ।
आख्या नित्य नूतन सृजन में विश्वास रखती हैं।
समाज के बदलते परिवेश के साथ मन की सम विषम परिस्थितियों में कल्पना कमनीयता तो है ही ,साथ में
समाज की विद्रूपताएं ,बेचैनी,आक्रोश और बगावत को 
भी सहजता से उकेरा है।कुछ गीत समाज में व्याप्त बुराईयों पर करारा व्यंग्य हैं।
समाज के ठेकेदार और नीति नियंता जब जनसाधारण का शोषण कर अपनी रोटी सेंकते है  तो  इनकी कलम 
बोल उठती है..

अब मदारी कौन होगा
कौन खेले नव खिलौना
दल सभी अब स्वप्न देखें
स्वर्ण का ही हो बिछौना
फिर कृषक का नाम लेकर
उठ रही मुट्ठी अनेकों 
ताप मुद्दों को मिले जब
जल रही भट्ठी अनेकों

विरोध के बादल मंडरा रहे हैं ,विरोध के नाम पर विरोध कर मुद्दों को जब हवा दी जाती है तो आख्या की कलम आहत हो निजीकरण के लिए बोल उठी है

जिन्न बोतल से निकलता
अब चिरागों की लड़ाई
बादशाहत तब सिसकती
कौन खाये फिर मलाई
अटकलों की व्यंजना ये 
लिख रही चिट्ठी अनेकों

नवगीतकारा अपनी लेखनी को शस्त्र बनाकर कभी बाह्य समाज से तो कभी निज के अस्तित्व से रार करती हैं। सिसकियां भी फिर सिसकती हुई अनुभव होती हैं

खिड़कियाँ भी बंद है अब
श्वास को इच्छा तड़पती 
सात ताले कैद रखते
सिसकियां भी तब सिसकती
जो स्वयं को मुख निहारे
है कठिन पहचान पाना
फिर कहे अस्तित्व आकर
नित मुखौटा क्यों चुराना

समाज के संघर्ष,यातनाओं की कड़वी वास्तविकता
गीतों में तरन्नुम बन कर बस गयी है।शब्दों की उभरती 
उतरती अभिव्यक्ति पीड़ाओं,विडंबनाओं,संवेदनाओं 
और उलझनों का ब्यौरा है..

टीस से दर्पण कराहे
अश्रु की भीगी व्यथा है
याद करता नित्य आकर
उन सुखों की जो कथा है
पूछता दर्पण अकेला 
बिम्ब है कोई पुराना

बाजारवाद और मेलों ने सदा मनुष्य को आकर्षित किया है।बाजारवाद और विज्ञापन की चकाचौंध से वह आज भी अछूता नहीं रहा।सांसारिक संसाधनों के विज्ञापनों के
मकड़जाल से वह एक पल भी बाहर नहीं निकल पाता है।घरेलू खाद्य सामग्री से लेकर वस्त्र आभूषण श्रृंगार सब पर विज्ञापन कुंडली मारे बैठा है।ये संसाधन मदारी का रूप धारण करके डुगडुगी बजाते हुए मनुष्य को नचा रहें हैं।बुद्धि बनी गांधारी में आख्या जी की कलम इस पर करारा प्रहार करती है।

सजा धजा कर झूठ परोसा
चमचम रहती थाली
व्यंजन फीके निकले सारे
नमक मिर्च दें गाली
बाजार बजाता जब डमरू
चिल्लर बने जुआरी

नवगीतकारा ने अपने गीतों में नए नए प्रतीकों ,बिम्बों,
रूपकों,मिथकों से नूतनता ,नव्यता  का आगाज किया है।टीस से दर्पण की कराहट,शब्द लुभावन पासा फेंकें,
श्वास को इच्छा तड़पती,अब चिरागों की लड़ाई,स्वर्ण का हो बिछौना, साबुन बहस छिड़ाती,बुद्धि चंदन सी महकती,स्वर्ण का क्रंदन सुना क्या,सीप ने फिर सिर धुना क्या,अस्थियों का पुल बनाएं जैसे नवीन बिम्ब मन को आकर्षित करते हैं। दूध के दाँत ,भानुमति का पिटारा 
गरीबी में आटा गीला जैसे मुहावरों का बड़ा सटीक प्रयोग 
आख्या जी ने अपने गीतों में किया है।

भाव गहनता से कुछ स्थानों पर बोझिलता का आभास होता है किंतु नवगीतों का बीज तत्व मूलतः बिम्ब का मानवीय करण और मानविक पीड़ाओं की अभिव्यक्ति है।आख्या जी ने बाह्य जगत और आंतरिक जगत का सुंदर चित्र खींचा है इसके लिए वो तहेदिल से बधाई की पात्रा हैं ।

समीक्षक  :डॉ अनीता भारद्वाज 'अर्णव'
स्थान     :चरखी दादरी (हरियाणा)
चलभाष : 9896517159

Monday, December 13, 2021

द्वार पर दस्तक (गीत-नवगीत) संग्रह - समीक्षक डॉ. अनीता भारद्वाज 'अर्णव'

द्वार पर दस्तक : डॉ. अनीता भारद्वाज 'अर्णव' की समीक्षाकीय दृष्टि से ...

कवयित्री अमिता श्रीवास्तव 'दीक्षा' द्वार पर दस्तक गीत-नवगीत संग्रह - समीक्षक डॉ. अनीता भारद्वाज 'अर्णव'



"जीवन की उन्नति तथा प्रशस्त मार्ग की खोज: द्वार पर दस्तक"द्वार पर दस्तक यहाँ से खरीदें



 "द्वार पर दस्तक" अमिता श्रीवास्तव दीक्षा के सौ नव गीतों का अनुपम संग्रह है यह पुस्तक गीतों की ऐसी यात्रा है जो मन के द्वार तक दस्तक को पहुँचाने में सक्षम है। विज्ञात नवगीतमाला पर आयोजित नवगीत शतकवीर सम्मान प्राप्त करते हुए यह यात्रा विवेक से भावना की मंजिल तक पहुँचते-पहुँचते राहों के बहुत से दृश्य अपने नेत्रों के कैमरे में कैद कर लेती है:-

"टोकरी में चांद लेकर 
आ गया है वह निलय में 
----------------------------
सूर्य जब घुंघट हटाता 
कामना तब प्राप्त पूरी 
है प्रतिक्षित द्वार मेरा 
नेह की भाषा अधूरी 
वृक्ष के पल्लव झरे हैं
पतझड़ों की इस विजय में"
रात की कालिमा पर चांद की चमक मनोहारी है और कालिमा हटने के बाद उदित होता हुआ सूर्य प्रकृति के कण-कण का दर्शन कराता है जीवन में जिजीविषा को जागृत करता है। भोर खिल कर एक नवयौवना वधू सी निखरी-निखरी प्रतीत होती है वधू के आगमन पर प्रकृति रूपी परिवार के सभी सदस्य हर्ष और उल्लास से भर उठते हैं; पहन धूप की चूड़ियाँ
सजी वधू सी भोर।
---------------------
कलरव फिर करने लगा
नींदों में उल्लास 
उंगलियां लिखने लगी
जीवन का विन्यास।"
भोर होते ही जहाँ मंगलमयता का गान होता है वहीं मनुष्य अपनी दिनचर्या को प्रारंभ करते हुए कर्म का संदेश देने में जुट जाता है; बिना रुके बिना थके मनुष्य दौड़ने लगता है; यह अथक श्रम ऐसा आभास कराता है मानो मानव कोल्हू का बैल बन गया हो
जुता हुआ है भवसागर में
मानव है या बैल
संघर्षों में करे जुगाली 
थककर दुर्बल पाँव
रोज बनाने लग जाता है 
उर टूटी खपडैल 
मानव प्रकृति के बुद्धिजीवी प्राणियों में सर्वोच्च स्थान रखता है किंतु स्वार्थ लिप्सा के कारण वह दूसरों को हानि पहुँचाने में तनिक भी झिझक महसूस नहीं करता प्रकृति का दोहन तो उसकी प्रकृति बन गई है परिणाम आपदाएँ, महामारियाँ अपने विकराल रूप के साथ मानव से बदला लेना चाहती हैं। कोरोना काल में तालाबंदी मानव की कुत्सित भावना का ही परिणाम रहा 
'पथ खोजे राह' का एक दृश्य दर्शनीय हैं:-

नेक प्रकृति को लूट खसौटा 
नीति अनीति के लेकर घोड़े 
सृष्टि नियम का डंडा लेकर 
पामर के अब कान मरोड़े
खेल नियति भी हार चुकी है 
विडंबनाएँ चिन्ह दिखाये।"
एक अन्य उदाहरण
"व्यवधानों की लंबी सूची  
देख प्रकृति बौराई  
रौद्र रूप धारण कर रोके  
मानव की चतुराई।"
नव गीतों में ऐसे अनेकों दृश्य हैं जहाँ मानव ने प्रकृति से खिलवाड़ किया है:-
"अब उतर पगडंडियों से 
वह खड़ी उस मोड़ पर 
दंश देते पल चिढ़ाते 
क्या मिला सब जोड़कर 
साँझ ढलते ढूँढ़ती है 
बिम्ब की परछाइयाँ"।
मानव ने प्रकृति का ही नहीं नाजुक रिश्तो का भी दोहन कर डाला है जब आवश्यकता होती है तो गधे को भी बाप, बहन को भी आपा आप बोलता है। आवश्यकता निकल जाए तो तू कौन खामखा। 'दरकते रिश्ते' में देखिए
"जली अँगीठी खोले पानी
ऐसे रिश्ते उबल रहे
अहम् शान सिर पर बैठा 
भाव हृदय से फिसल रहे
बात-बात पर तू-तू मैं-मैं
पुष्प पर लगे टूट बिखरने।।"
और रिश्तो की हवेली में भी स्वार्थ का ही सिद्धांत लागू किया है जैसे
स्वार्थ का सिद्धांत लागू
नींव को ठोकर लगी है
भावना मन की सुलाई
वेदना हँस कर जगी है
पूछता दर्पण अकेला 
खो गया है घर पुराना 
ये हवेली क्यों मिटी है 
खंडहर से पूछ आना।।"
आज मीडिया का प्रभाव सबके सिर चढ़कर बोल रहा है। मीडिया ने मानव की मनोवैज्ञानिकता को अपने वश में कर लिया है मीडिया को चौथा स्तंभ कहा गया था किंतु उसी मीडिया ने मानव की भावनाओं से खिलवाड़ किया है; समाज की सच्चाई को आवृत कर लिया है। नवगीतकार 'दीक्षा' ने बताया है कि यहाँ सब कुछ बिक रहा है इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तो पूरी तरह से बिक चुकी है। देखिये-
"खोमचे में बिक रही है
देश में ईमानदारी 
पंक कीचड़ रख करें हैं 
राष्ट्र की तीमारदारी 
देश है सोया हुआ सा
कब हमारी नींद जागी।"
मीडिया का ही एक रूप फेसबुक यानी मुखपोथी को कवयित्री अन्य रोगों की भांति एक रोग बता रही है; जिसने मानव जाति को धरातल से उठाकर हवा में रहने का हुनर दे दिया है। स्वतंत्र होकर भी मनुष्य एक चलभाषी यंत्र के अधीन होकर रह गया। मानव के सभी कार्य उठते-बैठते, जन्मदिन-मरणदिन, हँसना-रोना सब मुख पोथी के साथ साझा होते हैं यह एक प्रकार से ज्वलंत समस्या है जिसने मानव को अपने चंगुल में जकड़ लिया है। मुखपोथी की बीमारी को कवयित्री ने उचित कहा है:-
यंत्र बना परतंत्र हुए हम 
जमा कक्ष सन्नाटा 
श्वास डोर महसूस करें अब
कितना किसको घाटा 
बंदर जैसे मानव नाचे 
साधन बने मदारी
कौन हवा में रिश्ते बहते 
बैठा नेह अटारी।"
अमिता चरैवेति-चरैवेति को साथ में रखते हुए पुस्तक में पुरातनता और नूतनता का सुंदर समावेश करती है। भले ही कितनी भी मानवीय जीवन की व्यस्तताएँ हों वह सृष्टि के सबसे छोटे जीव चींटी के माध्यम से जीवन की उन्नति, प्रशस्ति का मार्ग खोज लेती है भले ही कितनी भी कठिनाइयाँ आएँ लेकिन रुकना मना है। 'चीटियों का निवेदन' देखिए ...
मार्ग में रुकना नहीं है 
चीटियों का है निवेदन 
पीर अक्सर पूछती है 
किस सदी तक मौन रहना 
पत्थरों के हाथ निर्णय 
घाव कितना और सहना
जब धरा को ताव आता 
हिम ह्रदय का मान मर्दन 
निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि नवगीतों को पढ़कर पाठक एक लंबी मरूभूमि से गुजरते हुए हरे-भरे उपवन में प्रवेश कर जाता है कुछ देर ठहरता है और फिर नेति-नेति करता हुआ सुखद अहसास को अनुभव करता है; जो पाठक के मन में उत्साह, उमंग जागृति के भाव का संचार करता है कुछ स्थानों पर कथ्य, भाव पर हावी होता महसूस किया जा सकता है किंतु कथ्य में सरलता होने से पाठक के मन पर दस्तक होती है पाठक वर्ग से अपेक्षा है कि वह नवगीत में निहित संदेशों को ध्यान से पढ़ कर आत्मसात करेंगे अमिता श्रीवास्तव 'दीक्षा' को अनंत शुभकामनाएँ।

समीक्षक- डॉ० अनीता भारद्वाज अर्णव वरिष्ठ साहित्यकारा समाज सेविका, शिक्षा सेविका 
स्थान- चरखी दादरी (हरियाणा)
चलभाष -989651 7159

Friday, December 10, 2021

"छंद वर्ण के आंँगन गूंँजे" भारतीय काव्य साहित्य के लिए अनमोल धरोहर - परमजीत सिंह 'कोविद' कहलूरी



पुस्तक समीक्षा
"छंद वर्ण के आंँगन गूंँजे" भारतीय काव्य साहित्य के लिए अनमोल धरोहर


"छंद वर्ण के आँगन गूँजे" यह पुस्तक आदरणीय संजय कौशिक विज्ञात जी द्वारा बहुत ही मेहनत, वचनबद्धता और महत्वपूर्ण जानकारियों के साथ सुसज्जित है। पुस्तक में हिंदी साहित्य के प्राचीन छंदों के साथ-साथ नवीन छंदों का आविर्भाव अपने आप में एक अनोखी पहल है। यह किताब नवांकुरों को मात्राभार से लेकर रस,अलंकार और छंदों की गूढ़ता को समझने व उन्हें लिखने के लिए प्रेरित करती है। किताब में 11 रसों के साथ-साथ शब्दालंकार और अर्थालंकारों की सजीव व्याख्या की गई है जो पाठक को लेखन में भी सहायता प्रदान करती है।
जब किसी लेखक को मात्राभार की संपूर्ण समझ हो जाती है तो उसके बाद लिखने के लिए किसी निश्चित मापनी की आवश्यकता होती है। इस किताब में संजय कौशिक विज्ञात जी द्वारा कई प्रकार के प्राचीन और नवीन छंदों की मापनियां अंकित की गई हैं।
पुस्तक में लोक छंद भी सम्मिलित किए गए हैं। संपूर्ण पुस्तक में छंद शिल्प विधान उचित उदाहरणों सहित प्रदर्शित किए गए हैं। इससे प्रतीत होता है कि प्रत्येक छंद को कवि के हृदय ने छुआ है और अपनी लेखनी में उतारा है। कवि ने अपनी कलम से गागर में सागर भरने का कार्य किया है अपनी छोटी सी पुस्तक में उन्होंने एक बड़े ग्रंथ की जानकारियांँ सांँझा की हैं जिससे लेखक पढ़कर लाभ उठा सकता है और अपनी लेखन क्षमता में वांछित सुधार कर सकता है।

लिख कर छंद नवीन कुछ, शब्द चुने नवजात।
मात्राओं   का   ज्ञान   भी,   देते  हैं    विज्ञात।।

कवि ने अपनी इस किताब में संपूर्ण जानकारियों को तथ्यों के साथ प्रस्तुत किया है और बहुत ही सहजता से शब्दों में उकेरा है। छंदों के विधान के साथ प्रस्तुत उदाहरण बहुत ही आकर्षक हैं। विशुद्ध हिंदी के अलंकृत उदाहरण अपने विशेष कथन के कारण पाठक के मन में ना केवल अमिट छाप छोड़ते हैं अपितु लेखन हेतु प्रेरित भी करते हैं। पुरानी प्रचलित विधाओं के साथ-साथ इस पुस्तक में नए आविष्कार भी जुड़े हैं जो किताब की शोभा को चार चांद लगाते हैं। साहित्य को गंभीरता से सीखने के इच्छुक कलमकारों को यह संग्रह अवश्य पढ़ना चाहिए।

गणना मात्राभार की, सीखें लेखक आज।
नव छंदों की मापनी, सुझा रहे कविराज।।

संक्षेप में यदि कहा जाए तो महत्व की दृष्टि से यह पुस्तक लेखकों के लिए और साहित्य के नवांकुरों के लिए बहुत ही लाभकारी है। प्रारंभ से लेकर अंत तक पुस्तक को पढ़ने के पश्चात लेखक बहुत सारी महत्वपूर्ण जानकारियों से अभिभूत होगा और नवीन लेखन में उसकी समझ और प्रगाढ़ होगी। आदरणीय संजय कौशिक विज्ञात जी की यह पुस्तक साहित्य जगत में मील का पत्थर साबित होगी ऐसा मेरा मानना है।
इन्हीं शब्दों के साथ मैं आदरणीय संजय कौशिक विज्ञात जी को हार्दिक शुभकामनाएं प्रेषित करता हूंँ।

शुभ अभिवादन आपको, करो नवल अभ्यास।
नूतन  लेखन  से  सदा, रचो  नया इतिहास।।

 परमजीत सिंह 'कोविद' कहलूरी

छंद वर्ण के आँगन गूँजे : छंद रस अलंकार की अमूल्य निधि - समीक्षक कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

छंद वर्ण के आँगन गूँजे : छंद रस अलंकार की अमूल्य निधि - समीक्षक कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा' पुस्तक  "छंद वर्ण के आँगन गू...