Thursday, December 16, 2021

मन की वीणा : "नवगीतों के स्वर्णकाल से तप कर निकले कुंदन..." - समीक्षक अचला शर्मा

मन की वीणा यहाँ से खरीदें


मन की वीणा : "नवगीतों के स्वर्णकाल से तप कर निकले कुंदन..." - समीक्षक अचला शर्मा 
मन की वीणा - कवयित्री कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'
कवयित्री कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा' के सतत सृजन का प्रकाशित परिणाम द्वितीय संकलन मन की वीणा नवगीत-गीत संग्रह विज्ञात प्रकाशन से  प्रकाशित हो रहा है। विज्ञात नवगीत माला में शतकवीर नवगीत सम्मान प्राप्त 'प्रज्ञा' द्वारा इस संग्रह में 150 रचनाओं को सम्मिलित किया गया है। सभी रचना अपने आप में उत्कृष्ठ एवं अनुपम हैं। कवयित्री का लेखन कौशल और सृजनात्मक शैली के दृश्य देखते ही बनते हैं इन रचनाओं के सृजन में मुख्य आधार स्तम्भ छायावाद ही है। प्रतीकात्मक शैली में लिखी गई सभी रचनाएं अपने आप में अपनी उत्तमता के स्वर आलापती हैं। प्रस्तुत रचनाओं में अलंकारों की छटा भी अनायास ही झंकृत वीणा के स्वरों सी गुंजायमान होकर मधुमास का वातावरण निर्मित कर मंत्र मुग्ध कर साक्षात मोहिनी के पाश का कार्य करती प्रतीत होती हैं।
       शीर्षक 'कविता प्रिये' में सर्व प्रथम लिखा गया मुखड़ा है 

मन में जब अनुराग जगा था
मूरत इक साकार प्रिये।।

'कविता प्रिये' यह आकर्षक शीर्षक पर्याप्त है यह दर्शाने के लिए कि इस रचना में कवयित्री ने किस तरह भावनात्मक रूप से कथ्य को स्पष्ट किया है। और इस भावपूर्ण रचना अर्थात नवगीत को प्रिये संबोधन से अलंकृत किया है प्रिये संबोधन के चलते मानो प्रेयसी की भांति नवगीत जीवंत हो उठा है। मानो कवयित्री मन प्रेमी की तरह अपनी कविता से संवाद कर रहा प्रतीत होता है। इस प्रकार से यह एक श्रेष्ठ नवगीत का मुखड़ा पढ़ा गया है।

अब इसी रचना का एक अन्तरा भी देखते हैं 

तुम ही मेरी शैल गवरजा
चपल मोहिनी अरु ललिता
मानस में ऐसे रमती ज्यों 
क्षीर नीर सी हो सरिता


प्रथम अन्तरे में कवयित्री प्रेमी रूप में अपनी प्रेयसी कविता के सौंदर्य रूप और पावनता के चरित्र का वर्णन करता है। जिस सुंदर रूप ने मोहिनी सा मुग्ध कर लिया है। और उसके गुण चंचल शीतल सरिता के समान बताते हुए सशक्त भावाव्यक्ति प्रस्तुत की गई है।

अब इसी अन्तरे की पूरक पंक्ति भी देखते हैं 
बसा गुहा अंतस में रखलूं
सदा रहो अविकार प्रिये।।
सभी अच्छे गुण देखकर इस मोहिनी मूरत को अपने अंतस में प्रस्थापित करने की बात करता है।ऐसे में भी वह प्रेमी अपनी प्रेयसी से सभी विकारों से दूर रहने की अपेक्षा करता हुआ दर्शाया गया है। ऐसे में भाव प्रधान यह रचना नव्यता को धारण किये हुए है यह रचना प्रतीकात्मक शैली छायावाद का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।

कवि हृदय अपने आस पास के दृश्य बिम्ब को देखता है तब बहुत कुछ सीखता है और प्रकृति के अनेक दृश्य उसके कोमल हृदय को झकझोर देते हैं वह आहत हुआ उनसे वार्तालाप करता है तो कभी वे दृश्य साथ चलते प्रतीत होते हैं ऐसा ही एक दृश्य कवयित्री कुसुम कोठारी प्रज्ञा द्वारा 'शर्वरी का सौंदर्य' शीर्षक से लिखे गए नवगीत का मुखड़ा देखें 

चाँद झुकता शाख पर ज्यों 
फूल का मुख चूमता सा 
साथ में सपने सुहाने 
विश्व सारा घूमता सा।। 

प्रस्तुत रचना के मुखड़े में दृश्य बिम्ब के माध्यम से रात्रि में उदित चंद्रमा की छोटी छोटी क्रिया में सजीवता का आभास कवयित्री के हृदय ने किया तो उस आभास को लेखनी के माध्यम से नवगीत के रूप में पृष्ठ पर उकेरा तब यह दृश्य चित्र के रूप में पाठक के समक्ष स्वयं ही आकर खड़ा हो जाता है। इस प्रकार प्रतीकात्मक शैली में लिखा प्रेमरस पर आधारित यह नवगीत जिसमें चाँद और पुष्प के मधुर मिलन को दर्शाया गया है। कल्पना लोक में विचरण करता प्रेमी मन एक स्थान पर बैठे-बैठे ही पूरे विश्व का भ्रमण कर लेता है।

कवयित्री कुसुम कोठारी प्रज्ञा द्वारा सृजित इसी रचना का अन्तरा भी देखें ... 

राग छाया पात पल्लव 
जागता अनुराग धानी 
भीगती है ओस कण में 
सिमटती है रात रानी 
प्रेम के प्रस्फुटितकरण के अद्भुत क्षण शर्वरी में बिखरी धवल चाँदनी से अंकुरित होकर तरु के पात-पात पर बिखर जाती है उसी प्रकार से अनुराग का प्रभाव कण-कण में दिखाई देता है।  समूची सृष्टि नव शृंगार किये हुए धानी रंग में रंगी प्रतीत होती है। शर्वरी में भीगती ओस से सिमटती ओस की बूंदें वातावरण की ठंड का आभास दे रही हैं 

और अब इस रचना की पूरक पंक्ति की भावाभिव्यक्ति देखें 
और मतवाला भ्रमर भी 
आ गया है झूमता सा।।

शर्वरी में चाँदनी और ओस के कण के चलते रातरानी की सुगंध वातावरण में चहुँदिश अपना प्रभाव दिखा रही है ऐसे मनोहारी आकर्षक परिवेश में भंवरा भी भ्रामित होकर अपने स्वभाव के विपरीत रात्रि में झूमता हुआ उस अलौकिक वातावरण से आनंदित हुआ दिखाई पड़ता है। इस प्रकार से श्रेष्ठ भावाभिव्यक्ति प्रस्तुतिकरण कहा जा सकता है

नव्यता को धारण किये हुए और प्रदत्त प्रतीक के माध्यम से अपनी बात को काव्य रूप में कह देने में सिद्ध हस्त लेखनी की धनी कुसुम कोठारी प्रज्ञा की भाषा शैली स्पष्ट, क्लिष्ट हिन्दी शब्दों के प्रयोग से नवगीत का रूप सुदृढ करता है। तुकांत देखने में प्रायः उत्तम चयन किये गए हैं जबकि कहीं-कहीं साधारण स्तर के तुक भी देखने को मिले हैं भाव पक्ष उत्तम और श्रेष्ठ कहा जा सकता है जबकि कहीं-कहीं श्रेष्ठता और भी अधिक हो सकती है। उपमा उत्प्रेक्षा रूपक सहित मानवीकरण जैसे ढेरों अलंकारों का प्रयोग कवयित्री की सशक्त लेखनी में अनायास ही रमे हुए हैं जिनकी झलक पाठक वर्ग को इस संग्रह में देखने को बहुतायात मिलेगी। 
सुंदर नवनवेली दुल्हन के साथ में वीणा के चित्र से 'मन की वीणा' संग्रह के नाम के सौंदर्य के साथ न्याय करता है जिसका समर्पण कवयित्री ने अपनी माँ को समर्पित किया है शुभकामना संदेश से राज कमल कोठारी ने चार चांद लगा दिए हैं और भूमिका में नीतू ठाकुर विदुषी ने कवयित्री की सशक्त लेखनी से परिचित करवाया है अनुक्रमणिका कवयित्री के वृहत सृजन का परिचय देती है। फिर शुरू होती है यात्रा रचना पढ़ने की जो साधारण जन मानस को भी पूर्ण आनंदित करेगी और साहित्यिकता के मापदण्ड पर भी पूर्णतया खरी उतरेगी। 
कवयित्री कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा' का यह द्वितीय संग्रह कवयित्री को साहित्यकारों में सम्मिलित करवाने के लिए जाना जा सकेगा इसी विश्वास के साथ कवयित्री कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा' को उनकी साहित्यिक यात्रा के लिए अनंत बधाई एवं शुभकामनाएं 

अचला शर्मा 
समालखा पानीपत 
हरियाणा 132 101

30 comments:

  1. कुसुम जी का सौंदर्य-बोध, बिम्ब-विधान और शब्द-विन्यास अप्रतिम है। सही अर्थों में उनकी कविताएं मन की वीणा से निःसृत अलौकिक रागिनियाँ हैं। बधाई और शुभकामनाएं सुंदर कृति और उतनी ही सुंदर समीक्षा का।

    ReplyDelete
    Replies
    1. हृदय तल से आभार आदरणीय विश्व मोहन जी, आपकी चारु चमत्कृत टिप्पणी से मेरे संग्रह का मान बढ़ा गया ।
      सादर।

      Delete
  2. मेरे द्वितीय संग्रह "मन की वीणा नवगीत-गीत सैरभ" जो कि गुरुदेव संजय कौशिक विज्ञात जी के प्रोत्साहन और दिग्दर्शन से लिखा गया ,पर अचला शर्मा जी की सटीक समीक्षा ने गीतों के भावों को सुंदरता से मांज कर पाठकों के सम्मुख सौंदर्य से सजाया है जिससे लेखन सार्थकता पाकर धन्य हुआ है।
    अचला जी की विहंगम दृष्टि ने मेरे लेखन पर तारों की झालर गूंथ दी उनके इस लोमहर्षक कार्य से मेरी लेखनी नव ऊर्जा से
    भर गई , मैं अभिभूत हूं उनकी इस सुंदर समीक्षा से।
    मैं आदरणीया अचला जी का अंतस हृदय से आभार व्यक्त करती हूँ,उनके द्वारा की गई श्रमसाध्य समीक्षा के लिए।
    साथ ही गुरुदेव को आत्मीय आभार।
    सादर।
    आगे के संग्रह में इस संग्रह की कमियों को अवश्य पूरा करने का प्रयास रहेगा।
    सादर सस्नेह।

    ReplyDelete
  3. बहुत ही शानदार समीक्षा आंनद आ गया

    ReplyDelete
    Replies
    1. हृदय से आभार आपका पूनम जी।
      सस्नेह।

      Delete
  4. कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा' जी की किसी भी रचना को पढ़ने का अर्थ होता है उस विषय को गहनता से समझना और प्रेरित होना। वह एक बहुत अच्छी लेखिका होने के साथ ही बहुत अच्छी पाठिका भी हैं और हमेशा से रचना के मर्म को समझ कर अपनी प्रतिक्रियाओं के माध्यम से कलमकारों को ऊर्जावान बनाती आई हैं। उनके एकल संग्रह पर आदरणीया अचला शर्मा जी की समीक्षा ऐसे लग रही है जैसे सोने पर सुहागा। प्रत्येक रचना को जैसे सूक्ष्मदर्शी यंत्र से देखा और परखा गया है।
    जितना खूबसूरत संग्रह उतनी ही मनभावन समीक्षा....कुसुमजी और अचला जी दोनों ही बधाई की पात्र हैं ...हार्दिक शुभकामनाएं 💐💐💐💐

    ReplyDelete
    Replies
    1. आपकी टिप्पणी मुझे निशब्द कर गई नीतू जी,
      ये अनमोल शब्द आपके, मेरी संचित धरोहर के रूप में सदा सहेजे रहेगें।
      सस्नेह आभार आपका।

      Delete
  5. कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा' बहुमुखी प्रतिभा की धनी हैं. काव्य की अनेक विधाओं पर इन्हें महारत हासिल है. मुख्यतः शुद्ध प्रांजल हिंदी में, कभी राजस्थानी में और कभी-कभी उर्दू में भी इनकी रचनाएँ देखने को मिलती हैं.
    कुसुम जी के काव्य-संग्रह की सफलता सुनिश्चित है फिर भी उसकी सफलता के लिए मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ !

    ReplyDelete
    Replies
    1. मैं अभिभूत हूं आदरणीय आपकी उपस्थिति और साथ ही इस सांगोपांग प्रतिक्रिया से।
      आपकी उत्साहवर्धक टिप्पणी संजीवनी का काम करती है ।
      सदा आशीर्वाद मिलता रहे।
      सादर।

      Delete
  6. श्रेष्ठ सृजनकार आ० कुसुम कोठारी प्रज्ञा जी की कृति की उत्कृष्ट समीक्षा पढ़कर सहज ही संपूर्ण कृति के पारायण हेतु मन लालायित हो उठता है। आ० कुसुम जी व भाषा-भाव की धनी, उत्कृष्ट समीक्षिका आ० अचला शर्मा जी- दोनों ही बधाई की पात्र हैं। शुभमस्तु।

    ReplyDelete
    Replies
    1. हृदय तल से आभार आदरणीय,आप जैसे प्रबुद्ध साहित्यकारों से सराहना पाना लेखन के लिए सम्मान का विषय है।
      पुनः आभार आदरणीय।
      सादर।

      Delete
  7. मनमोहक नवगीत एवं अचलाजी शर्मा की बहुत सुंदर समीक्षा ।

    ReplyDelete
  8. एक शानदार लेखनी को समर्पित बेहतरीन समीक्षा👏👏👏👏👏👏👏👏👏

    ReplyDelete
    Replies
    1. स्नेह सिक्त प्रतिक्रिया के लिए आत्मीय आभार सखी।
      सस्नेह।

      Delete
  9. बेहद खूबसूरत नवगीत👌👌 बेहतरीन समीक्षा।

    ReplyDelete
    Replies
    1. आपकी स्नेहिल प्रतिक्रिया से लेखन को सदा ऊर्जा मिलती है सखी।
      सस्नेह।

      Delete
  10. आदरणीय कुसुम जी को हर रचना एक अमित छाप छोड़ जाती है,प्रकृति श्रृंगार के तो क्या कहने ? ऐसा छायाचित्र उकेरती हैं कि पाठक सम्मोहित हुए बिना न रह सके, विविधता भरा उनका लेखन बड़ी प्रेरणा देता है । हम उनसे निरंतर सीख लेते हैं ।
    आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि कुसुम जी की पुस्तक
    साहित्य के क्षेत्र में ऊंची उड़ान भरेगी । उन्हें मेरी हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई 💐💐
    सुंदर,सारगर्भित और रोचक समीक्षा के लिए अचला जी को मेरी हार्दिक शुभकामनाएं 💐💐

    ReplyDelete
    Replies
    1. मैं निशब्द हूँ!!
      अप्रतिम अनमोल उपमाओं से नवाज दिया आपने जिज्ञासा जी , आपकी प्रतिक्रिया सदा मेरे लेखन को प्रोत्साहित करती है।
      ज्यादा कुछ नहीं बस स्नेह और स्नेह।

      Delete
  11. बेहतरीन कवयित्री कुसुम जी के लिए अचला जी द्वारा की गई समीक्षा अक्षरशः उपयुक्त है, बहुत बहुत बधाई

    ReplyDelete
    Replies
    1. हृदय से आभार भारती जी आपको ब्लॉग पर देखकर मन खुशी से भर गया।
      आपकी स्नेहिल प्रतिक्रिया सदा अमूल्य है मेरे लिए।

      Delete
  12. काव्य-संग्रह 'मन की वीणा नवगीत-गीत सौरभ' के प्रकाशन पर आदरणीया कुसुम कोठारी दीदी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ.
    सुंदर समीक्षा लिखी है आदरणीया अचला जी ने, उन्हें बधाई.

    ReplyDelete
    Replies
    1. हृदय से आभार आपका भाई रविन्द्र जी।
      आपकी स्नेहिल शुभकामनाएं सदा आगे का मार्ग प्रशस्त करेगी।
      सस्नेह आभार।

      Delete
  13. आदरणीय कुसुम दी जितनी सराहना की जाए उतनी कम है। जितना निर्मल इनका सृजन है उतने ही निर्मल हृदय की स्वामीनी है। आदरणीय अचला जी की सराहनीय समीक्षा।
    दोनों को हार्दिक बधाई।

    ReplyDelete
    Replies
    1. आपके निश्छल बोल सदा मेरा विश्वास द्विगुणित करते हैं प्रिय अनिता ।
      बहुत बहुत आभार आपकी स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिए।
      सस्नेह।

      Delete
  14. हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं आ.कुसुम जी आपको द्वितीय संग्रह की...आपके लेखन की तो कायल हूँ मैं । आपके नवगीतों में अद्भुत बिम्ब एवं व्यंजनाएं पाठक को विस्मित कर देती हैं..
    जैसा कि आ.अचला जी ने अपनी समीक्षा में भी लिखा है रस छन्द भाव अलंकार जो काव्य की आत्माएं हैं आपके नवगीतों में कूट-कूटकर भरी रहती हैं...आ.अचला जी की लाजवाब समीक्षा आपके काव्य संग्रह की विशेषताओं को बताने में पूर्णतया सक्षम है एवं संग्रह पढ़ने हेतु मन को लालायित कर रही है...।हार्दिक बधाई आ.अचला जी को इतनी सुन्दर समीक्षा हेतु।
    आपको भी अनंत शुभकामनाएं एवं बधाई।


    ReplyDelete
  15. प्रिय सुधा जी आपकी समीक्षात्मक टिप्पणी सदा मेरा मार्गदर्शन करती है,आपका स्नेह से भरा साथ हमेशा मेरा उत्साह वर्धन करता है।
    सच कहूं तो अपनी किसी भी रचना पर आपकी अनुपस्थिति से मुझे अधूरेपन का अहसास होता है।
    आपके सुंदर उद्गारों से लेखन सार्थक होता है
    ढेर ढेर सा स्नेह आभार।
    सस्नेह।

    ReplyDelete
  16. हमारी प्रिय कुसुम जी की हर रचना अप्रतिम होती है ,मैं तो प्रारंभ से ही उनकी प्रशंसक रही हूँ ,बात चाहे प्रकृति के श्रृंगार की हो या अन्य कोई भी विषय हो ,कुसुम जी हर विधा में माहिर हैं । आदरणीय अचला जी भी इतनी सुंदर समीक्षा के लिए बधाई की पात्र हैं । ढेरों शुभकामनाएँ 💐💐💐💐

    ReplyDelete
    Replies
    1. Shubha Mehta शुभा जी आपकी प्रतिक्रिया से अभिभूत हूं। आपका स्नेह सदा मिलता रहता है,आपकी स्नेह भरी प्रतिक्रया से लेखन सार्थकता को अग्रसर होता है।
      हृदय से आभार आपका।
      सस्नेह।

      Delete
  17. अप्रतिम रचनाओं की उत्कृष्ट समीक्षा। अद्भूत विम्ब और विस्तृत शब्दकोश से परिपूर्ण सारी नवगीत ।
    बहुत बहुत बधाई आ०

    ReplyDelete

छंद वर्ण के आँगन गूँजे : छंद रस अलंकार की अमूल्य निधि - समीक्षक कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

छंद वर्ण के आँगन गूँजे : छंद रस अलंकार की अमूल्य निधि - समीक्षक कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा' पुस्तक  "छंद वर्ण के आँगन गू...