Thursday, December 16, 2021

विदुषी व्यंजना : शब्द शक्ति की गंगोत्री से उद्गम अनुपम नवगीत संग्रह - समीक्षक अचला शर्मा

विदुषी व्यंजना : शब्द शक्ति की गंगोत्री से उद्गम अनुपम नवगीत संग्रह - समीक्षक अचला शर्मा 

विदुषी : व्यंजना - कवयित्री नीतू ठाकुर 'विदुषी' 


विदुषी की रचना मेरी दृष्टि में .... 
अचला शर्मा 


विज्ञात नवगीत माला के नवगीत शतकवीर कार्यक्रम से प्रस्फुटित नवगीतों की यह धारा ठीक उसी प्रकार से निरन्तर कल्याणकारी विदुषी : व्यंजना यहाँ से खरीदें है जिस प्रकार से  बहती हुई एक नदिया शीतल जल प्रवाह के सहारे समस्त मानव जाति का कल्याण करती हुई निरन्तर प्रवाहित होती रहती है। ऐसे में कविजन उस नदिया की कल-कल की ध्वनि से वार्तालाप करते हैं तो कभी उस कल-कल की ध्वनि में छिपे काल की तरह निरन्तर बढ़ते रहने के संदेश सुन कर अपनी कविताओं के माध्यम से पाठक वर्ग को रोमांचित कर देते हैं 
 ऐसे में कवयित्री नीतू ठाकुर 'विदुषी' का संग्रह विदुषी : व्यंजना उस नदिया के जीवन अर्थात यात्रा काल में आने वाली परेशानी को सुनकर नदिया के त्रस्त हृदय की व्यथा को और किसी भी पर्व पर समाज द्वारा मानाये जाने वाले हर्ष में भी उस पर्व का कष्ट अपने चित्रित बिम्ब के माध्यम से अपनी काव्य शैली में उकेर कर व्यथित हृदय की व्यंजना के चलचित्र दर्शाने में सफल प्रयोग कर देती हैं। विज्ञात प्रकाशन के माध्यम से प्रकाशित विदुषी : व्यंजना (नवगीत-गीत संग्रह) में कवयित्री ने व्यंजना की एक नई परम्परा को जन्म देकर सिद्ध कर दिखाया है कि कवि मन कल्पनाओं के क्षितिज में और ऊँचा उड़ सकता है। अपने निकटतम वातावरण में संभावित संभावनाओं के घटित होने की प्रक्रिया में उन्हें पूर्णतया बलवती करके साक्षात आकार देते हुए कवि हृदय काव्य की परम्परा को सदैव निभाते आये हैं। नई कविता नव्यता के सुनहरी वस्त्र धारण कर कुंदन सी कायामय मनोहारी आकर्षक का केंद्र मोहिनी अप्सरा से भी बढ़कर होती है। प्रदत्त बिम्ब के माध्यम से सशक्त कथन इसकी पहचान कही जाती है मुहावरे युक्त कथ्य इस विधा के सौंदर्य में चार चांद लगा देते हैं। और कोमल हृदय से शब्द शक्ति व्यंजना का प्रवाह कवयित्री नीतू ठाकुर 'विदुषी' की रचनाओं में मुख्य केंद्र बिंदु रहता है 'चील अनिष्ट ले मंडराई' शीर्षक से लिखी गई रचना के मुखड़े के माध्यम से कवयित्री कहती हैं देखें ...

टूट रही थी श्वास डोर जब
चील अनिष्ट ले मंडराई
घूम रहे थे धरती अम्बर
या निर्धनता की खाई

भाव यह है कि विपदाएँ जब आती हैं तो चारों दिशाओं से ही आती हैं। जिसमें मनुष्य स्वयं को लाचार तथा असहाय महसूस करता है। विपदाएँ तो प्रत्येक मनुष्य के जीवन का हिस्सा हैं। पर निर्धन व्यक्ति के जीवन में इनकी संख्या कुछ अधिक अवश्य देखी जाती है। जैसे छोटी-छोटी खुशियों के लिये भी साधारणतया लोगों को अनेक प्रकार के मूल्य चुकाने पड़ते हैं। ऐसे ही हर आशंका एक नई विपदा की सूचना देती हुई सी प्रतीत होती है और भयभीत मन को ढांढस बंधाना कठिन और दुष्कर कहा जाता है। तो ऐसे में अनेक भ्रांतियां बन जाती हैं कि अपने दूर हैं या अपने सौभाग्य की दूरी किसी खाई के चलते और अधिक दूर दिख रही है ... 

लाशों के अंबार लगे है
भोज करे कुत्ता टोली
एक बूंद पानी को तरसे
पयो लगे विष की गोली

वीभत्स रस पर आधारित यह रचना अपना परिचय स्वयं देती है इस अंतरे में कवयित्री नीतू ठाकुर विदुषी के द्वारा दृश्य बिम्ब पर लिखे गए भावयुक्त सृजन की गाथा भी भली भांति कह देने में सक्षम और समर्थ है। कवयित्री कहती हैं कि कभी-कभी मनुष्य को ऐसे भयावह दृश्यों का सामना करना पड़ जाता है जिनकी कल्पना उसने कभी स्वप्न में भी नही की होती। स्वार्थ के वशीभूत होकर डूबती हुई मनुष्य जाति, मानव-धर्म को भूलकर अपने लालच वश मृत्यु के दूत बन अपने ही भाई बंधुओं के प्राणों का हरण कर रहे हैं। अपने लालच के चलते किसी प्यासे की प्यास बुझाने के स्थान उन्हें तरसाया जाता है। अब पूरक पंक्ति में कवयित्री कहती हैं कि मनुष्य के अंदर की मानवता नष्ट हो जाती है तब .....
पवन चली दुर्गंध समेटे
हाड़ माँस की चिकनाई।।
ऐसे दृश्य को प्रकृति देखती है तो वह भी क्रुद्ध होकर मनुष्य का साथ छोड़ती सी दिख रही है। वातावरण में हाड़ मास की दुर्गंध इस तरह से समाहित है कि श्वास लेना भी दूभर हो चला है। शुष्क कंठ के चलते चिकनाई का स्रोत एक बूँद जल की है उसके लिए भी यह जीवन तड़पता सा प्रतीत होता है और वह जीवन मृत्यु की याचना करता है।

'आपका आभास' शीर्षक से सृजन की गई रचना के मुखड़े में कवयित्री प्रेम विषय पर अपनी लेखनी का परिचय देती हुई कहती हैं कि...

फिर पलक झुक कर निहारे
आपका आभास पाकर।
गूँजती है मौन वाणी
फिर अधूरा गीत गाकर।।

प्रेम एक अबूझ पहेली जैसा है रहस्यमयी अनुभव है जिसकी गहराई का अनुमान लगाना अत्यंत कठिन तथा दुष्कर कार्य कहा गया है। प्रेम कभी अकेला जन्म नही लेता अपने साथ अनेक भाव लेकर उपजता है। परंतु उसके सबसे निकट करुण रस है जो विरह से जन्म लेता है। अपने प्रिय को अपने निकट रखने की चाह में मन भ्रामक कल्पनाएँ करने लगता है। भ्रम लोक में विचरण करते हुए कुछ क्षण के लिए ही सही पर नायिका अपने सभी दुख भूल कर बीते हुए मिलन के क्षणों की स्मृति से विशेष आनंद की अनुभूति करती है जिस कारण उसके ह्रदय की धड़कनों के वाद्य यंत्र पर उसके अधर स्वयं कोकिला से गीत गुनगुनाने लगते हैं। गूँजती है मौन वाणी विरोधाभास का जीवंत उदाहरण है इसी रचना के अन्तरे में कवयित्री कहती हैं 

अंतरे में तुम समाये
गीत की रसधार फूटी
तन बिना मन के मिलन से
इस जगत की रीत टूटी

विरह अग्नि में जलते व्यथित हृदय में जब गीत प्रस्फुटित होता है तो उसके हर शब्द में सिर्फ उसके मनमीत की छवि होती है। प्रेम रस से सम्पूर्ण वातावरण सुगंधित हो लाखों योजन की दूरी को क्षणमात्र में मिटा देता है। कवयित्री ने ये क्षणिक यात्रा स्वप्न लोक की कही है क्योंकि मन से मन के मिलन का संबंध इतना प्रगाढ़ होता है कि बिना किसी औचारिक मिलन के भी वो स्वयं में सम्पूर्ण है। और पूरक पंक्ति में भी भाव ज्यों के त्यों बने हुए हैं विरह रस को विरोधाभास से जीवंत कर दिया है... 
मोड़ते हैं मुख जहाँ से
हम दुखों पर मुस्कुराकर।।
सामाजिक रीतियाँ मनुष्य के शुद्र तन पर प्रतिबंध लगा सकती है। इन प्रतिबंधों को भी कवयित्री ने सम्मान की दृष्टि से देखते हुए प्रेयसी को आत्मीय सुख की अनुभूति के चलते स्वयं को मोड़ लेने की बात स्वीकार की है। और प्रेम अपनी चरम सीमा पर हो तो त्याग में ही महानता दर्शाने का प्रयास किया है इससे स्पष्ट है कि कवयित्री सामाजिक परंपराओं का निर्वहन करने में सक्षम और समर्थ है।

फूल से चुभने लगे है
शुष्क से क्यों नेत्र मेरे
तैरते हैं आँसुओं में
जब पिघलते स्वप्न तेरे

कल्पनाओं के भ्रम का जाल जब टूटता है और यथार्थ की अँधेरी परछाई मन मस्तिष्क को घेर लेती है तब कोमल पुष्प भी नेत्रों को चुभने लगते हैं। अपने प्रिय को खो देने का भय जब हृदय में व्याप्त होता है नैनों में समाये स्वप्न मोम की भाँति पिघलकर आँसुओं संग बहते दिखाई देते हैं।

पूछ लो कैसे बिताये
बिन तुम्हारे वर्ष आकर।।

प्रेम भरा संसार जब मिटाता हुआ दिखाई देता है तब मिलन की उत्कंठा बढ़ती है और मन चाहता है कि उसके मीत तक उसकी दारुण दशा का हाल पहुँचे।
 
इस प्रकार से करुण, प्रेम, वीभत्स वीर रस सहित बहुरसों तथा उपमा, उत्प्रेक्षा, यमक, अनुप्रास और मानवीकरण अन्योक्ति सहित  अनेक अलंकारों की छटा पूरे संकलन को पठन योग्य बनाती हैं। 113 गीत-नवगीत का यह संकलन पाठक वर्ग के लिए प्रत्येक रचना के गहनतम विचारों से कल्पना के अद्भुत क्षितिज की यात्रा करवाता हुआ दिखाई देगा। विज्ञात प्रकाशन के माध्यम से प्रकाशित सुंदर और आकर्षक आवरण जिस पर स्वयं कवयित्री का चित्र अंकित है इस पृष्ठ का सौंदर्य निखार रहा है। अंतिम पृष्ठ पर कवयित्री का संक्षिप्त जीवन परिचय है 15 साल के निरन्तर लेखन के पश्चात प्रथम एकल संकलन निश्चित ही परिक्व काव्य सृजन के दर्शन करवाने का एक उत्तम माध्यम यह संकलन कहा जा सकता है। समर्पण गुरु के पश्चात शुभकामना संदेश ....  तथा भूमिका बाबूलाल शर्मा बौहरा 'विज्ञ' द्वारा लिखित है कवयित्री की लेखनी से लेख में कवयित्री ने पाठक वर्ग को संग्रह से परिचित करवाया है।  तत्पश्चात अनुक्रमणिका से यात्रा प्रारम्भ होती है विदुषी : व्यंजना नवगीत-गीत संग्रह की जो कवयित्री को साहित्यिक पृष्ठभूमि से जोड़ती दिखाई देगी। संग्रह में भाषा शैली सरल स्पष्ट है बिम्ब के माध्यम से कथ्य को सुदृढ बनाया गया है हालांकि सपाट कथन की उपास्थिति भी देखी जा सकती है। कुछ रचनाओं में तुक बंदी उत्तम से श्रेष्ठ हो सकती हैं कुछ रचनाओं में स्वछंद सावधानी से निभाये जा सकते थे भावपक्ष उत्तम है कथ्य में नव्यता के प्रयास श्रेष्ठ हैं कवयित्री नीतू ठाकुर विदुषी द्वारा प्रारम्भ की गई यह साहित्यिक यात्रा इनके साहित्यकार बनने तक अवश्य चलती रहे और साहित्य जगत कवयित्री को स्वीकार कर साहित्य जगत में स्थान अवश्य दे इन्ही शुभकामनाओं के साथ आज की लेखन यात्रा को विराम।

अचला शर्मा 
समालखा पानीपत 
हरियाणा 132101

12 comments:

  1. बहुत बहुत आभार आदरणीया इतनी विस्तृत और गहन समीक्षा करने के लिए। साधारण सी रचनाओं का आपके शब्दों ने मोल बढ़ा दिया। रचना को देखने और समझने का आपका दृष्टिकोण बहुत ही प्रेरक है ...पुनः हार्दिक आभार।

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  2. पारखी दृष्टिकोण से की गई सकारात्मक एवं सुंदर समीक्षा 👌🙏

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    1. शुक्रिया विधा जी 🙏

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  3. गहन और उत्कृष्ट समीक्षा आ0

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    1. धन्यवाद आख्या जी 🙏

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  4. उत्तम समीक्षा , उत्कृष्ट रचना

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    1. शुक्रिया विपुला जी 🙏

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  5. "विदुषी व्यंजना"
    नीतू ठाकुर 'विदुषी' जी का एकल संग्रह ।
    नीतू ठाकुर 'विदुषी' जी अपने उपनाम को सार्थक करती हुई साक्षात विदुषी, माँ वीणा पाणी की असीम अनुकम्पा हैं उनपर।
    सभी विधाओं में पारंगत सीखने की अदम्य पिपासा नेतृत्व का सुनियोजित सामर्थ्य, और अनुपम लेखन। आपका साहित्य उत्थान में निरंतर सहयोग आपकी अपने कार्य के प्रति प्रतिबद्धता सब कुछ अतुल्य है।

    आदरणीय अचला शर्मा जी के द्वारा शानदार समीक्षा की गई है "विदुषी" जी के गीत-नवगीत संग्रह पर, अचला जी की विस्तृत समीक्षा संग्रह का संक्षिप्त रसवादन करवा रही है, साथ ही प्रेरित कर रही है पूरी गागर छक ली जाए।
    गूढ़ व्यंजनाओं का भावार्थ करके अचला जी ने मुग्ध कर दिया , बहुत सुंदर समीक्षा की है आपने अचला जी आपको इस श्रमसाध्य कार्य के लिए साधुवाद एवं बधाई।
    विदुषी जी को उनके काव्य संग्रह की सफलता के लिए हृदय से बधाई एवं शुभकामनाएं।

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद प्रज्ञा जी 🙏

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  6. आपकी साहित्यिक अभिरुचि और प्रतिबद्धता दोनों का जबाब नहीं। बहुत सुंदर सार्थक समीक्षा।
    बधाई।

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