Wednesday, December 15, 2021

देहरी गाने लगी : नव्यता के स्वर्ण पदक धारे नवगीत - डॉ० अनीता भारद्वाज 'अर्णव'

देहरी गाने लगी यहाँ से खरीदें

"देहरी गाने लगी" नव्यता के स्वर्ण पदक धारे  नवगीत - डॉ० अनीता भारद्वाज 'अर्णव'

देहरी गाने लगी - अनिता सुधीर आख्या 

"देहरी गाने लगी" कवयित्री अनिता सुधीर आख्या के नवगीतों का संग्रह है। विज्ञात नवगीत माला के शतकवीर कार्यक्रम से निर्मित यह संकलन एक सशक्त नवगीत संकलन है। जीवन के गणित से परिस्थितियों का जमा, घटा, गुणा भाग कर एक सुलझी हुई जीवन शैली में पदार्पण करती हैं।आख्या जी की विभिन्न विषयों पर आधारित रचनाएं छन्द आधारित संग्रह में आसानी से देखी जा सकती है।नवगीतों के माध्यम से  समाज व मानवता का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया गया है।इनके माध्यम से कर्मपथ पर बढ़ते हुए नए अनुभव साझा किए गए हैं ।
आख्या नित्य नूतन सृजन में विश्वास रखती हैं।
समाज के बदलते परिवेश के साथ मन की सम विषम परिस्थितियों में कल्पना कमनीयता तो है ही ,साथ में
समाज की विद्रूपताएं ,बेचैनी,आक्रोश और बगावत को 
भी सहजता से उकेरा है।कुछ गीत समाज में व्याप्त बुराईयों पर करारा व्यंग्य हैं।
समाज के ठेकेदार और नीति नियंता जब जनसाधारण का शोषण कर अपनी रोटी सेंकते है  तो  इनकी कलम 
बोल उठती है..

अब मदारी कौन होगा
कौन खेले नव खिलौना
दल सभी अब स्वप्न देखें
स्वर्ण का ही हो बिछौना
फिर कृषक का नाम लेकर
उठ रही मुट्ठी अनेकों 
ताप मुद्दों को मिले जब
जल रही भट्ठी अनेकों

विरोध के बादल मंडरा रहे हैं ,विरोध के नाम पर विरोध कर मुद्दों को जब हवा दी जाती है तो आख्या की कलम आहत हो निजीकरण के लिए बोल उठी है

जिन्न बोतल से निकलता
अब चिरागों की लड़ाई
बादशाहत तब सिसकती
कौन खाये फिर मलाई
अटकलों की व्यंजना ये 
लिख रही चिट्ठी अनेकों

नवगीतकारा अपनी लेखनी को शस्त्र बनाकर कभी बाह्य समाज से तो कभी निज के अस्तित्व से रार करती हैं। सिसकियां भी फिर सिसकती हुई अनुभव होती हैं

खिड़कियाँ भी बंद है अब
श्वास को इच्छा तड़पती 
सात ताले कैद रखते
सिसकियां भी तब सिसकती
जो स्वयं को मुख निहारे
है कठिन पहचान पाना
फिर कहे अस्तित्व आकर
नित मुखौटा क्यों चुराना

समाज के संघर्ष,यातनाओं की कड़वी वास्तविकता
गीतों में तरन्नुम बन कर बस गयी है।शब्दों की उभरती 
उतरती अभिव्यक्ति पीड़ाओं,विडंबनाओं,संवेदनाओं 
और उलझनों का ब्यौरा है..

टीस से दर्पण कराहे
अश्रु की भीगी व्यथा है
याद करता नित्य आकर
उन सुखों की जो कथा है
पूछता दर्पण अकेला 
बिम्ब है कोई पुराना

बाजारवाद और मेलों ने सदा मनुष्य को आकर्षित किया है।बाजारवाद और विज्ञापन की चकाचौंध से वह आज भी अछूता नहीं रहा।सांसारिक संसाधनों के विज्ञापनों के
मकड़जाल से वह एक पल भी बाहर नहीं निकल पाता है।घरेलू खाद्य सामग्री से लेकर वस्त्र आभूषण श्रृंगार सब पर विज्ञापन कुंडली मारे बैठा है।ये संसाधन मदारी का रूप धारण करके डुगडुगी बजाते हुए मनुष्य को नचा रहें हैं।बुद्धि बनी गांधारी में आख्या जी की कलम इस पर करारा प्रहार करती है।

सजा धजा कर झूठ परोसा
चमचम रहती थाली
व्यंजन फीके निकले सारे
नमक मिर्च दें गाली
बाजार बजाता जब डमरू
चिल्लर बने जुआरी

नवगीतकारा ने अपने गीतों में नए नए प्रतीकों ,बिम्बों,
रूपकों,मिथकों से नूतनता ,नव्यता  का आगाज किया है।टीस से दर्पण की कराहट,शब्द लुभावन पासा फेंकें,
श्वास को इच्छा तड़पती,अब चिरागों की लड़ाई,स्वर्ण का हो बिछौना, साबुन बहस छिड़ाती,बुद्धि चंदन सी महकती,स्वर्ण का क्रंदन सुना क्या,सीप ने फिर सिर धुना क्या,अस्थियों का पुल बनाएं जैसे नवीन बिम्ब मन को आकर्षित करते हैं। दूध के दाँत ,भानुमति का पिटारा 
गरीबी में आटा गीला जैसे मुहावरों का बड़ा सटीक प्रयोग 
आख्या जी ने अपने गीतों में किया है।

भाव गहनता से कुछ स्थानों पर बोझिलता का आभास होता है किंतु नवगीतों का बीज तत्व मूलतः बिम्ब का मानवीय करण और मानविक पीड़ाओं की अभिव्यक्ति है।आख्या जी ने बाह्य जगत और आंतरिक जगत का सुंदर चित्र खींचा है इसके लिए वो तहेदिल से बधाई की पात्रा हैं ।

समीक्षक  :डॉ अनीता भारद्वाज 'अर्णव'
स्थान     :चरखी दादरी (हरियाणा)
चलभाष : 9896517159

9 comments:

  1. बहुत सुंदर संग्रह और सटीक समीक्षा
    अनंत बधाइयां

    ReplyDelete
  2. सादर अभिवादन

    आ0 अनिता अर्णव जी द्वारा दी गयी समीक्षा से मैं अभिभूत हूँ
    और आभारी हूँ
    उनके और गुरु जी के मार्गदर्शन में निरंतर प्रयास जारी है ।
    आपकी समीक्षा मेरे लिए अनमोल है ।
    अपना स्नेह बनाये रखें
    सादर

    ReplyDelete
  3. "देहरी गाने लगी"अनिता सुधीर आख्या जी के नवगीतों का एकल संग्रह है।
    अनिता जी की यथार्थ वादी लेखनी सदा ही सामायिक परिस्थितियों का विश्लेषणात्मक
    चित्र खींचती है, सामाजिक राजनैतिक वीसंगतियों पर निष्पक्ष प्रहार करती है।
    शिल्प सधा हुआ रहता है। आख्या जी एक उत्कृष्ट लेखिका हैं, मैं सदा से उनके लेखन की स्पष्ट वादियां की प्रसंशक रही हूं,जो उनके लेखन में साफ झलकता है।

    आदरणीय डॉ अनीता भारद्वाज 'अर्णव'जी ने उनके संग्रह "देहरी गाने लगी"की समीक्षा और समालोचना बहुत ही गहन अध्ययन के बाद की है, और उनके लेखन के तत्वों पर समुचित प्रकाश डाला है ।
    उनकी कुछ रचनाओं पर उनके विश्लेषणात्मक उद्गार पढ़ने योग्य है ।
    अर्णव जी की समीक्षा ने आख्या जी के संग्रह पर चार चाँद लगा दिये हैं ,समीक्षा पढ़ते ही पुस्तक के प्रति हर काव्य प्रेमी का रुझान निश्चित है।
    आदरणीय अर्ण़व जी को शानदार समीक्षा के लिए अंतर हृदय से अनंत बधाई।
    आख्या जी को अपने इस एकल संग्रह की सफलता के लिए हृदय से शुभकामनाएं।
    जब आख्या जी की पुस्तक हाथ में आयेगी मन की देहरी साक्षात गाने लगेगी।
    सादर सस्नेह।

    ReplyDelete
    Replies
    1. सखी आप की निःशब्द करती हुई टिप्पणी हृदय को छू गयी ।
      अपना स्नेह बनाये रखें

      Delete
  4. आख्या जी का लेखन सदा से सधा हुआ और आकर्षक रहा है। उनके बिम्ब और कथन पढ़ने के बाद मस्तिष्क को सोचने के लिए प्रेरित करते हैं। डॉ अनिता भारद्वाज 'अर्णव' जी ने बहुत ही सटीक समीक्षा की है ...पढ़कर ऐसे लगा जैसे मेरे मन की बात कह दी हो। इस आकर्षक संग्रह की अनंत शुभकामनाएं 💐💐💐
    माँ शारदे की कृपा सदा आप पर बनी रहे 🙏

    ReplyDelete
    Replies
    1. धन्यवाद नीतू जी
      आप का सदा ही प्रोत्साहन मिला है
      और मार्गदर्शन भी
      सादर आभार

      Delete

छंद वर्ण के आँगन गूँजे : छंद रस अलंकार की अमूल्य निधि - समीक्षक कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

छंद वर्ण के आँगन गूँजे : छंद रस अलंकार की अमूल्य निधि - समीक्षक कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा' पुस्तक  "छंद वर्ण के आँगन गू...