Monday, December 13, 2021

द्वार पर दस्तक (गीत-नवगीत) संग्रह - समीक्षक डॉ. अनीता भारद्वाज 'अर्णव'

द्वार पर दस्तक : डॉ. अनीता भारद्वाज 'अर्णव' की समीक्षाकीय दृष्टि से ...

कवयित्री अमिता श्रीवास्तव 'दीक्षा' द्वार पर दस्तक गीत-नवगीत संग्रह - समीक्षक डॉ. अनीता भारद्वाज 'अर्णव'



"जीवन की उन्नति तथा प्रशस्त मार्ग की खोज: द्वार पर दस्तक"द्वार पर दस्तक यहाँ से खरीदें



 "द्वार पर दस्तक" अमिता श्रीवास्तव दीक्षा के सौ नव गीतों का अनुपम संग्रह है यह पुस्तक गीतों की ऐसी यात्रा है जो मन के द्वार तक दस्तक को पहुँचाने में सक्षम है। विज्ञात नवगीतमाला पर आयोजित नवगीत शतकवीर सम्मान प्राप्त करते हुए यह यात्रा विवेक से भावना की मंजिल तक पहुँचते-पहुँचते राहों के बहुत से दृश्य अपने नेत्रों के कैमरे में कैद कर लेती है:-

"टोकरी में चांद लेकर 
आ गया है वह निलय में 
----------------------------
सूर्य जब घुंघट हटाता 
कामना तब प्राप्त पूरी 
है प्रतिक्षित द्वार मेरा 
नेह की भाषा अधूरी 
वृक्ष के पल्लव झरे हैं
पतझड़ों की इस विजय में"
रात की कालिमा पर चांद की चमक मनोहारी है और कालिमा हटने के बाद उदित होता हुआ सूर्य प्रकृति के कण-कण का दर्शन कराता है जीवन में जिजीविषा को जागृत करता है। भोर खिल कर एक नवयौवना वधू सी निखरी-निखरी प्रतीत होती है वधू के आगमन पर प्रकृति रूपी परिवार के सभी सदस्य हर्ष और उल्लास से भर उठते हैं; पहन धूप की चूड़ियाँ
सजी वधू सी भोर।
---------------------
कलरव फिर करने लगा
नींदों में उल्लास 
उंगलियां लिखने लगी
जीवन का विन्यास।"
भोर होते ही जहाँ मंगलमयता का गान होता है वहीं मनुष्य अपनी दिनचर्या को प्रारंभ करते हुए कर्म का संदेश देने में जुट जाता है; बिना रुके बिना थके मनुष्य दौड़ने लगता है; यह अथक श्रम ऐसा आभास कराता है मानो मानव कोल्हू का बैल बन गया हो
जुता हुआ है भवसागर में
मानव है या बैल
संघर्षों में करे जुगाली 
थककर दुर्बल पाँव
रोज बनाने लग जाता है 
उर टूटी खपडैल 
मानव प्रकृति के बुद्धिजीवी प्राणियों में सर्वोच्च स्थान रखता है किंतु स्वार्थ लिप्सा के कारण वह दूसरों को हानि पहुँचाने में तनिक भी झिझक महसूस नहीं करता प्रकृति का दोहन तो उसकी प्रकृति बन गई है परिणाम आपदाएँ, महामारियाँ अपने विकराल रूप के साथ मानव से बदला लेना चाहती हैं। कोरोना काल में तालाबंदी मानव की कुत्सित भावना का ही परिणाम रहा 
'पथ खोजे राह' का एक दृश्य दर्शनीय हैं:-

नेक प्रकृति को लूट खसौटा 
नीति अनीति के लेकर घोड़े 
सृष्टि नियम का डंडा लेकर 
पामर के अब कान मरोड़े
खेल नियति भी हार चुकी है 
विडंबनाएँ चिन्ह दिखाये।"
एक अन्य उदाहरण
"व्यवधानों की लंबी सूची  
देख प्रकृति बौराई  
रौद्र रूप धारण कर रोके  
मानव की चतुराई।"
नव गीतों में ऐसे अनेकों दृश्य हैं जहाँ मानव ने प्रकृति से खिलवाड़ किया है:-
"अब उतर पगडंडियों से 
वह खड़ी उस मोड़ पर 
दंश देते पल चिढ़ाते 
क्या मिला सब जोड़कर 
साँझ ढलते ढूँढ़ती है 
बिम्ब की परछाइयाँ"।
मानव ने प्रकृति का ही नहीं नाजुक रिश्तो का भी दोहन कर डाला है जब आवश्यकता होती है तो गधे को भी बाप, बहन को भी आपा आप बोलता है। आवश्यकता निकल जाए तो तू कौन खामखा। 'दरकते रिश्ते' में देखिए
"जली अँगीठी खोले पानी
ऐसे रिश्ते उबल रहे
अहम् शान सिर पर बैठा 
भाव हृदय से फिसल रहे
बात-बात पर तू-तू मैं-मैं
पुष्प पर लगे टूट बिखरने।।"
और रिश्तो की हवेली में भी स्वार्थ का ही सिद्धांत लागू किया है जैसे
स्वार्थ का सिद्धांत लागू
नींव को ठोकर लगी है
भावना मन की सुलाई
वेदना हँस कर जगी है
पूछता दर्पण अकेला 
खो गया है घर पुराना 
ये हवेली क्यों मिटी है 
खंडहर से पूछ आना।।"
आज मीडिया का प्रभाव सबके सिर चढ़कर बोल रहा है। मीडिया ने मानव की मनोवैज्ञानिकता को अपने वश में कर लिया है मीडिया को चौथा स्तंभ कहा गया था किंतु उसी मीडिया ने मानव की भावनाओं से खिलवाड़ किया है; समाज की सच्चाई को आवृत कर लिया है। नवगीतकार 'दीक्षा' ने बताया है कि यहाँ सब कुछ बिक रहा है इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तो पूरी तरह से बिक चुकी है। देखिये-
"खोमचे में बिक रही है
देश में ईमानदारी 
पंक कीचड़ रख करें हैं 
राष्ट्र की तीमारदारी 
देश है सोया हुआ सा
कब हमारी नींद जागी।"
मीडिया का ही एक रूप फेसबुक यानी मुखपोथी को कवयित्री अन्य रोगों की भांति एक रोग बता रही है; जिसने मानव जाति को धरातल से उठाकर हवा में रहने का हुनर दे दिया है। स्वतंत्र होकर भी मनुष्य एक चलभाषी यंत्र के अधीन होकर रह गया। मानव के सभी कार्य उठते-बैठते, जन्मदिन-मरणदिन, हँसना-रोना सब मुख पोथी के साथ साझा होते हैं यह एक प्रकार से ज्वलंत समस्या है जिसने मानव को अपने चंगुल में जकड़ लिया है। मुखपोथी की बीमारी को कवयित्री ने उचित कहा है:-
यंत्र बना परतंत्र हुए हम 
जमा कक्ष सन्नाटा 
श्वास डोर महसूस करें अब
कितना किसको घाटा 
बंदर जैसे मानव नाचे 
साधन बने मदारी
कौन हवा में रिश्ते बहते 
बैठा नेह अटारी।"
अमिता चरैवेति-चरैवेति को साथ में रखते हुए पुस्तक में पुरातनता और नूतनता का सुंदर समावेश करती है। भले ही कितनी भी मानवीय जीवन की व्यस्तताएँ हों वह सृष्टि के सबसे छोटे जीव चींटी के माध्यम से जीवन की उन्नति, प्रशस्ति का मार्ग खोज लेती है भले ही कितनी भी कठिनाइयाँ आएँ लेकिन रुकना मना है। 'चीटियों का निवेदन' देखिए ...
मार्ग में रुकना नहीं है 
चीटियों का है निवेदन 
पीर अक्सर पूछती है 
किस सदी तक मौन रहना 
पत्थरों के हाथ निर्णय 
घाव कितना और सहना
जब धरा को ताव आता 
हिम ह्रदय का मान मर्दन 
निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि नवगीतों को पढ़कर पाठक एक लंबी मरूभूमि से गुजरते हुए हरे-भरे उपवन में प्रवेश कर जाता है कुछ देर ठहरता है और फिर नेति-नेति करता हुआ सुखद अहसास को अनुभव करता है; जो पाठक के मन में उत्साह, उमंग जागृति के भाव का संचार करता है कुछ स्थानों पर कथ्य, भाव पर हावी होता महसूस किया जा सकता है किंतु कथ्य में सरलता होने से पाठक के मन पर दस्तक होती है पाठक वर्ग से अपेक्षा है कि वह नवगीत में निहित संदेशों को ध्यान से पढ़ कर आत्मसात करेंगे अमिता श्रीवास्तव 'दीक्षा' को अनंत शुभकामनाएँ।

समीक्षक- डॉ० अनीता भारद्वाज अर्णव वरिष्ठ साहित्यकारा समाज सेविका, शिक्षा सेविका 
स्थान- चरखी दादरी (हरियाणा)
चलभाष -989651 7159

10 comments:

  1. बहुत ही आकर्षक संग्रह 👌
    शानदार समीक्षा आदरणीया अर्णव जी 🙏
    अमिता श्रीवास्तव 'दीक्षा' जी को अनंत शुभकामनाएँ 💐💐💐

    ReplyDelete
    Replies
    1. हार्दिक आभार नीतू दी

      Delete
  2. वाह वाह वाह बहुत सुन्दर आकर्षक संग्रह शानदार समीक्षा दी🙏🙏🙏🙏 बहुत बधाई आपको

    ReplyDelete
  3. अति उत्तम समीक्षा आ0 अर्णव जी द्वारा
    उत्कृष्ट नवगीत विविध आयाम

    ReplyDelete
  4. बहुत सुंदर और सटीक रचना ।

    ReplyDelete
  5. एक आदर्श लेखिका के अतुल्य संग्रह पर अतुल्य समीक्षा।
    अमिताजी बहुत ज्यादा नहीं लिखती पर जितना लिखती हैं वो अप्रतिम सौंदर्य से भरपूर होता है,सधा हुआ शिल्प,नव व्यंजनाएं,गगन भाव, अभिनव प्रतीक।
    आदरणीय अर्ण़व जी ने "द्वार पर दस्तक"की सांगोपांग समीक्षा लिखी है,जो सचमुच हृदय द्वार पर पुस्तक को पढ़ने के लिए सीधी दस्तक है ।
    आदरणीय अर्ण़व जी को इस अप्रतिम समीक्षा के लिए साधुवाद और बधाई।
    पुस्तक की सफलता के लिए अमिता जी को अनंत शुभकामनाएं।
    सादर सस्नेह।

    ReplyDelete
    Replies
    1. हार्दिक आभार पूनम जी आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया से अति प्रसन्नता हुई , आदरणीया अर्णव जी की अद्भुत समीक्षा लेखन पथ को अवश्य नई दिशा देगी

      Delete
  6. जितना सुंदर अमिता जी का संग्रह है उससे कहीं अधिक आकर्षक आदरणीया अर्णव जी की समीक्षा है👏👏👏👏👏👏एक एक चुनिंदा नवगीत को लेकर,उनकी सबसे बेहतरीन पंक्तियों पर अलग-अलग समीक्षात्मक विश्लेषण पाठक को आकर्षित करता है इस संग्रह को पढ़ने के लिये।एक अतुलनीय संग्रह की अद्वितीय समीक्षा👏👏👏👏👏👏👏👏👏

    ReplyDelete
  7. हार्दिक आभार अनुपमा जी

    ReplyDelete

छंद वर्ण के आँगन गूँजे : छंद रस अलंकार की अमूल्य निधि - समीक्षक कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'

छंद वर्ण के आँगन गूँजे : छंद रस अलंकार की अमूल्य निधि - समीक्षक कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा' पुस्तक  "छंद वर्ण के आँगन गू...