पुस्तक समीक्षा
"छंद वर्ण के आंँगन गूंँजे" भारतीय काव्य साहित्य के लिए अनमोल धरोहर
"छंद वर्ण के आँगन गूँजे" यह पुस्तक आदरणीय संजय कौशिक विज्ञात जी द्वारा बहुत ही मेहनत, वचनबद्धता और महत्वपूर्ण जानकारियों के साथ सुसज्जित है। पुस्तक में हिंदी साहित्य के प्राचीन छंदों के साथ-साथ नवीन छंदों का आविर्भाव अपने आप में एक अनोखी पहल है। यह किताब नवांकुरों को मात्राभार से लेकर रस,अलंकार और छंदों की गूढ़ता को समझने व उन्हें लिखने के लिए प्रेरित करती है। किताब में 11 रसों के साथ-साथ शब्दालंकार और अर्थालंकारों की सजीव व्याख्या की गई है जो पाठक को लेखन में भी सहायता प्रदान करती है।
जब किसी लेखक को मात्राभार की संपूर्ण समझ हो जाती है तो उसके बाद लिखने के लिए किसी निश्चित मापनी की आवश्यकता होती है। इस किताब में संजय कौशिक विज्ञात जी द्वारा कई प्रकार के प्राचीन और नवीन छंदों की मापनियां अंकित की गई हैं।
पुस्तक में लोक छंद भी सम्मिलित किए गए हैं। संपूर्ण पुस्तक में छंद शिल्प विधान उचित उदाहरणों सहित प्रदर्शित किए गए हैं। इससे प्रतीत होता है कि प्रत्येक छंद को कवि के हृदय ने छुआ है और अपनी लेखनी में उतारा है। कवि ने अपनी कलम से गागर में सागर भरने का कार्य किया है अपनी छोटी सी पुस्तक में उन्होंने एक बड़े ग्रंथ की जानकारियांँ सांँझा की हैं जिससे लेखक पढ़कर लाभ उठा सकता है और अपनी लेखन क्षमता में वांछित सुधार कर सकता है।
लिख कर छंद नवीन कुछ, शब्द चुने नवजात।
मात्राओं का ज्ञान भी, देते हैं विज्ञात।।
कवि ने अपनी इस किताब में संपूर्ण जानकारियों को तथ्यों के साथ प्रस्तुत किया है और बहुत ही सहजता से शब्दों में उकेरा है। छंदों के विधान के साथ प्रस्तुत उदाहरण बहुत ही आकर्षक हैं। विशुद्ध हिंदी के अलंकृत उदाहरण अपने विशेष कथन के कारण पाठक के मन में ना केवल अमिट छाप छोड़ते हैं अपितु लेखन हेतु प्रेरित भी करते हैं। पुरानी प्रचलित विधाओं के साथ-साथ इस पुस्तक में नए आविष्कार भी जुड़े हैं जो किताब की शोभा को चार चांद लगाते हैं। साहित्य को गंभीरता से सीखने के इच्छुक कलमकारों को यह संग्रह अवश्य पढ़ना चाहिए।
गणना मात्राभार की, सीखें लेखक आज।
नव छंदों की मापनी, सुझा रहे कविराज।।
संक्षेप में यदि कहा जाए तो महत्व की दृष्टि से यह पुस्तक लेखकों के लिए और साहित्य के नवांकुरों के लिए बहुत ही लाभकारी है। प्रारंभ से लेकर अंत तक पुस्तक को पढ़ने के पश्चात लेखक बहुत सारी महत्वपूर्ण जानकारियों से अभिभूत होगा और नवीन लेखन में उसकी समझ और प्रगाढ़ होगी। आदरणीय संजय कौशिक विज्ञात जी की यह पुस्तक साहित्य जगत में मील का पत्थर साबित होगी ऐसा मेरा मानना है।
इन्हीं शब्दों के साथ मैं आदरणीय संजय कौशिक विज्ञात जी को हार्दिक शुभकामनाएं प्रेषित करता हूंँ।
शुभ अभिवादन आपको, करो नवल अभ्यास।
नूतन लेखन से सदा, रचो नया इतिहास।।
परमजीत सिंह 'कोविद' कहलूरी
बहुत ही शानदार संग्रह है और आपने उसके विषय में लिखा भी बहुत अच्छा है....बधाई 💐💐💐
ReplyDeleteअति उत्तम
ReplyDeleteबहुत सुन्दर
ReplyDeleteएक शानदार संग्रह की अद्वितीय समीक्षा👌👌👌👌👌
ReplyDeleteसुंदर समीक्षा 👌👌 बधाई , शुभकामनाएं
ReplyDeleteस्थापित छंद शिल्प को नवल बाना पहनाकर तथा नये आविष्कृत छंदों को सरलता से उदाहरण सहित समझा कर, नये रचना शिल्पियों के लिए एक उपयोगी महत्वपूर्ण पुस्तक जिसमें छंद शिल्प,मापनी कल संयोजन और सभी महत्वपूर्ण जानकारियां बड़ी सूक्ष्म और सरल रूप में दी गई है।
ReplyDeleteआदरणीय संजय कौशिक विज्ञात जी को साहित्य क्षेत्र में इस सांगोपांग कार्य के लिए अनंत बधाई एवं साधुवाद।
उनकी ये पुस्तक हर साहित्य प्रेमी के हाथ में पहुंचे, आत्मीय शुभकामनाएं।
हर नव शिल्पकार इस एक पुस्तक से बहुत कुछ सीख सकता है ।
हर सीखने वाला इस पुस्तक के सहयोग से स्वयं अपना मार्गदर्शक बन सकता है।
आदरणीय कोविद साहब ने पुस्तक की सुंदर व्याख्या सटीक समीक्षा की है उनको इस महत्वपूर्ण कार्य के लिए बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं।
लेखक और समीक्षक दोनों को पुनः बधाई।
पुस्तक की सफलता के लिए हृदय से शुभकामनाएं।
सादर।
बहुत सुन्दर पढ़कर आंनद आ गया लेखक और समीक्षक दोनों को पुनः बधाई ढेरों शुभकामनाएं
ReplyDeleteजय हो
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